Thursday, 24 May 2012

एहसास


सतिपाल खुल्लर

वह अभी दिहाड़ी करने जाने ही लगा था कि उसके पिता ने अपने सिर चढ़े कर्ज की बात छेड़ दी।
“बापू, तू ऐसे न सोचा कर, तेरे सिर चढ़े सारे पैसै  उतार देंगे।”
“बेटे, मैं ढीला रहता हूँ, मैं चाहता हूँ कि मेरे सिर से कर्ज उतरे और मेरी जान आसानी से निकले। थोड़ा सोच-समझ कर खर्च करो और…”
“बापू, इतनी चिंता न किया कर।”
“बेटे, सयानों का कहना है कर्ज कियामत और भूख नियामत।”
“ठीक है बापू, जैसे तू कहे।”
शाम को लड़का जब घर आया तो हाथ-मुँह धोकर पिता के पास जा बैठा।
“ले बापू, आज से तू सुर्खरू, तेरे सिर अब एक पैसे का कर्ज भी नहीं।”
“शाबाश मेरे बेटे! ऐसी औलाद भगवान सब को दे।”
रात हो गई, पर पिता को नींद नहीं आई। करवटें बदलते ही गुजर गई सारी रात। दिन चढ़े लड़का दिहाड़ी करने चला गया। शाम को लौटा तो पिता बारे पूछा।
“वह तो तुम्हारे पीछे-पीछे ही दिहाड़ी करने चला गया था।”
बात करते-करते ही पिता आ गया।
“बापू, तुम बीमार होकर भी दिहाड़ी…?”
“बेटे, तूने मेरे सिर से कर्ज का बोझ उतार कर अपने सिर चढ़ा लिया। मुझे सब पता है, बूढ़ी आँखों से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता। तूने ब्याज पर पैसे लेकर कर्ज उतारा है।”
“फिर क्या हुआ बापू!…तू दिहाड़ी पर न जाता…”
“बेटे, तेरे सिर पर कर्जा हो और मैं आराम से आँखें मीच लूँ, यह कैसे हो सकता है?”
बेटे ने देखा पिता के चेहरे पर थकावट की जगह चमक थी।
                         -0-

Sunday, 6 May 2012

भीतर की बात


                   
                   
दर्शन जोगा

“आंटी जी!” सुषमा ने आवाज़ लगाते हुए दरवाजे की बाहर वाली जाली भी खड़काई।
“आजा बेटी, आजा।” आवाज़ सुनते ही पवित्र कौर बोली।
दोनों की आवाज़ें सुनकर बैड पर लेटा सुच्चा सिंह उठ कर बैठ गया और कमरे में से ही बोला, “आओ बेटे, आ जाओ।”
महीने की पहली तारीखों में इस सेवानिवृत जोड़े की आवाज़ अपने किरायेदारों के प्रति आम दिनों से काफी मीठी हो जाती है।
“बैठो बेटा।” पवित्र कौर ने ड्राइंगरूम में लेजाकर सुषमा को सोफे की ओर इशारा करते हुए कहा।
“और बेटा, सब ठीक है?”
“हाँ, आंटी जी!” सुषमा ने किराये के पैसे मालकिन की ओर बढ़ाते हुए कहा।
“तेरा स्वास्थ्य कैसा है, कल डॉक्टर के पास गए थे?” पवित्र कौर फिर बोली।
“बस! ठीक ही है, दवाई ले रही हूँ।”
“कोई न बेटी, वाहेगुरु भली करेगा। उसके घर देर है, अँधेर नहीं। मैं तो तेरे अंकल से भी कई बार बात करती हूँ, भई इतनी नर्म लड़की है बेचारी, कितने साल हो गए रब्ब की ओर देखती को। कइयों के तो यूं ही फेंके जाता है, पत्थरों की तरह। और बेटी, जब से अपना लछमन बठिंडे रहने लगा है, हमारा तो आप मन नहीं लगता बच्चों के बिना।”
“आंटी, आपको तो पता ही है कि मेरे तो सारे टैस्ट ठीक आए हैं। इनके टैस्ट किए हैं, डॉक्टर कहता है, इन्हें अभी कुछ देर और दवाई लेनी पड़ेगी। आपके पास तो मन हल्का कर लेती हूँ, सभी को तो नहीं बता सकती न भीतर की बात।”
“चल कोई न बेटी, राम भली करेगा। जाती हुई दरवाजा ढ़ाल देना।”
पति वाले कमरे में जा, पैसे अलमारी में सँभालते हुए पवित्र कौर बोली, “देख लो बेचारी कितनी ऊनी है। दोनों जने चुप-चाप बैठे रहते हैं। न खड़का, न दड़का। सुबह ड्यूटी पर चले जाते हैं, शाम को घर लौटते हैं। कमरे में बैठों का पता भी नहीं लगता।”
“यही तो बात है, उन पहले वालों के तो बच्चे ही नहीं टिकते थे। तीन-चार थे, साले सारा दिन धमा-चौकड़ी मचाई रखते। इस बार इसी लिए सोच कर मकान दिया है किराये पर।”
“अच्छा, धीरे बोलो, ऐसे ही अगला कई बार सुन लेता है भीतर की बात।”
पवित्र कौर ने खिड़की में से बाहर की आहट लेते हुए कहा।
                     -0-

Sunday, 29 April 2012

बुजुर्ग रिक्शावाला


                      
                   
श्याम सुन्दर अग्रवाल

गली के मोड़ पर पहुँचा तो आज फिर वही बुजुर्ग रिक्शावाला खड़ा था। तीन दिन से वही खड़ा मिलता है, सुबह-सुबह। मन ने कहा, इसके रिक्शा में बैठने से तो पैदल ही चला चलूँ, बीस मिनट का तो रास्ता है। घड़ी देखी तो इतना ही समय बचा था। कहीं बस ही न निकल जाए, सोच कर मन कड़ा किया और रिक्शा में बैठ गया।
मन बना लिया था कि आज रिक्शावाले की ओर बिलकुल नहीं देखना। इधर-उधर देखता रहूँगा। पिछले तीन दिनों से इसी रिक्शा में बैठता रहा हूँ। जब भी रिक्शावाले पर निगाह टिकती, मैं वहीं उतरने को मज़बूर हो जाता।
पैडलों पर जोर पड़ने की आवाज़ सुनाई दी और रिक्शा चल पड़ा। मैं इधर-उधर देखने लगा। ‘ग्रीन मोटर्स” का बोर्ड दिखा तो याद आया कि पहले दिन तो यहीं उतर गया था। बहाना बना दिया था कि दोस्त ने जाना है, उसके साथ ही चला जाऊँगा। अगले दिन मन को बहुत समझाया था, लेकिन फिर भी दो गली आगे तक ही जा सका था।
‘कड़-कड़’ की आवाज़ ने मेरी तंद्रा को भंग किया। रिक्शा की चेन उतर गई थी। मेरी निगाह रिक्शावाले पर चली गई। उसके एक पाँव में पट्टी बंधी हुई थी और पाँवों में जूते भी नहीं थे। मुझे याद आया कि जब बापू के पाँव में कील लग गई थी, वह भी ठंड में इसी तरह नंगे पाँव फिरता रहा था। चेन ठीक कर बुजुर्ग ने पाजामा ऊपर चढ़ाया तो निगाह ऊपर तक चली गई। बापू भी पाजामा इसी तरह ऊपर चढ़ा लेता था। मुझे लगा, जैसे रिक्शावाला कुछ बोल रहा है। मेरा ध्यान खुद-ब-खुद उस के सिर की ओर चला गया। उसकी ढ़ीली सी पगड़ी और बोलते हुए सिर हिलाने के ढंग ने मुझे भीतर तक हिला दिया। बहुत प्रयास के पश्चात भी मैं उस पर से अपनी नज़र नहीं हटा सका। बेइख्त्यार मेरे मुख से निकल गया, “बापू, रिक्शा रोक।”
वह बोला, “क्या हो गया बाबू जी?”
“कुछ नहीं, एक ज़रूरी काम याद आ गया!” मैंने रिक्शा से उतर उसको पाँच रुपये का नोट देते हुए कहा।
                      -0-

Tuesday, 17 April 2012

खुशी


हरप्रीत सिंह राणा

बहू-बेटे ने बापू की चारपाई पशुओं के बाड़े में डाल दी। एक दिन सुबह-सुबह खुशी में मस्त बेटा मिठाई का डिब्बा ले बापू के पास जाकर बोला, “बापू! बधाई हो! तेरे पोता हुआ है।”
बापू एकटक बेटे की ओर देखता रहा।
“क्या बात बापू, तुझे खुशी नहीं हुई?” बेटा बापू के व्यवहार से झुँझला कर बोला।
“पुत्तर! खुशी तो बहुत है…पर मैं तेरे बारे में सोच रहा हूँ…”
“क्या बापू? बेटे ने उत्सुकता से पूछा।
“अब मेरे बाद इस चारपाई का वारिस तूने ही बनना है…।”
बापू की व्यंग्यभरी बात के आगे बेटा निरुत्तर था।
                            -0-

Tuesday, 10 April 2012

बीमार सपना


अमृत लाल मन्नन

रामलाल अपने दोस्त के फोन द्वारा मिले संदेश अनुसार उसे डॉ. राजेश के क्लिनिक पर मिलने के लिए तैयार होने लगा। वह सोच रहा था कि चमन लाल को कैसे ज़रूरत पड़ गई यहाँ? उसका तो अपना बड़ा बेटा इस समय एम.बी.बी.एस के फाइनल में पढ़ता है।
चमन लाल उसका बचपन का दोस्त है। उसने कारोबार शुरू करने के बाद यह तय किया कि वह दोनों बेटों को डॉक्टर बनाएगा। उसका विश्वास था कि डॉक्टरी के व्यवसाय में ही सबसे अधिक लाभ है। दो बेटे डॉक्टर, दो बहुएँ डॉक्टर, बड़ा-सा नर्सिंग-होम और फिर पैसों की बरसात। इसलिए उसने शुरू से ही बेटों को पढ़ाई के सिवा कुछ नहीं करने दिया। स्कूल, पढ़ाई, ट्यूशनें, पढ़ाई। और पहुँचा दिए दोनों बेटे मैडीकल कालेज।
रामलाल जब डॉ. राजेश के क्लिनिक पर पहुँचा, तब चमन लाल बाहर ही उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। रामलाल ने मिलते ही बेटों का हाल पूछा।
 चमन लाल ने कहा, “क्या बताऊँ, यार! बड़ा बेटा आखरी साल में फेल हो गया। चलो वह भी कोई बात नहीं। पर उसका तो मन ही उचाट हो गया पढ़ाई से।”
“तूने पढ़ाया भी तो बहुत है उसे। चलो कोई बात नहीं।” राम लाल ने उसे ढाढ़स बंधाया।
“पढ़ता तो है, पर अब साहित्य की किताबे पढ़ता है। कहता है मैं कहानियाँ लिखूंगा और पता नहीं क्या कुछ…।”
“चल चिंता न कर ज्यादा। अच्छा यह बता आज यहाँ कैसे आया?”
“वही तो तुझे बता रहा हूं। अपने डॉक्टर को ही लाया हूं दिखाने।”
                             -0-

Monday, 2 April 2012

इज़्ज़त


सुखदेव सिंह शाँत

पड़ोसियों के घर के आगे रोज़ शाम कभी कोई स्कूटर वाला आ जाता, कभी कोई कार वाला। कभी कोई साइकिल पर थैला लटकाए आ पहुँचता। कई बार तो दो-दो, चार-चार आदमी एक साथ भी आ जाते।
माता प्रीतम कौर अकसर अपने बेटे जसवंत से शिकायत करती, नौकरी तो बेटे तू भी करता है, पर पड़ोसियों के मोहन की ओर देख। इसकी भला कैसी नौकरी है? कोई न कोई आया ही रहता है। अपने तो कोई आता ही नहीं। उसकी माँ खुशी से उड़ती फिरती है।”
बेटा माँ के पास अपना दुःख व्यक्त करता, “माँ, इस युग में अध्यापक को कौन पूछता है! कहने को तो हम कौम के निर्माता होते हैं, पर समाज में हमारा मोल एक टका भी नहीं।”
और फिर अचानक लड़के की ड्यूटी बोर्ड की वार्षिक परीक्षा में लग गई।
पता नहीं लोग कहाँ-कहाँ से घर पूछ कर उनके आ पहुँचे।
शाम को तो जैसे कतार ही लग गई। प्रीतम कौर के पाँव ज़मीन पर नहीं लग रहे थे। जैसे उसने मोहन की माँ से कोई बड़ा मोर्चा जीत लिया हो।
                           -0-

Monday, 26 March 2012

साँप


जगदीश राय कुलरियाँ

कई दिनों से बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। लोग पशुओं के चारे के लिए भी परेशान थे। साहसी लोग सिर पर खाली बोरियाँ ओढ़ खेतों में से चारा लेने जा रहे थे।
अपने इकलौते बेटे जीत को खेत की ओर जाते देख, प्रीतम कौर के मुख से निकल गया, “पुत्तर! जरा देख कर जाना… इस मौसम में ससुरे साँप-संपोलिए सब बाहर निकल आते हैं…”
इस एक वाक्य ने उसके जीवन के पिछले जख़्मों को हरा कर दिया। उसे याद आया कि पति की रस्म-पगड़ी के बाद रिश्तेदारों ने ज़ोर देकर उसके जेठ के बड़े बेटे को उनके पास सहारे के रूप में छोड़ दिया था।  एक रात अचानक उसकी नींद खुल गई। उसने देखा कि वह लड़का उसकी सो रही जवान बेटियों के सिरहाने खड़ा कुछ गलत करने की चेष्टा कर रहा था।
“जा निकल जा मेरे घर से…ज़रूरत नहीं है मुझे तेरे सहारे की…मैं तो अकेली ही भली…भगवान सहारे अपनी मेहनत मज़दूरी से बच्चों को पाल लूँगी…जा तू दफा हो जा…” अगली सुबह रोते हुए उसने जेठ के लड़के को घर से बाहर कर दिया था।
‘जानवर तो छेड़ने पर ही कुछ कहते हैं, उसका तो पता होता है कि भई नुकसान पहुँचा सकता है, पर आस्तीन के साँप का क्या पता कि किस वक्त डस ले…” अतीत की बातों को याद करते हुए प्रीतम कौर का मन भर आया।
                         -0-