Showing posts with label सुखदेव सिंह शांत. Show all posts
Showing posts with label सुखदेव सिंह शांत. Show all posts

Wednesday, 31 October 2012

शिक्षा



सुखदेव सिंह शाँत

एक छोटे से बच्चे ने ईंट उठा कर गली में जा रहे कुत्ते के पिल्ले के दे मारी और ऊँची आवाज़ में बोला, तेरी माँ की…चल दौड़ यहाँ से!
एक घर के आगे बैठी तीन पड़ोसनों ने बच्चे के मुख से इतनी गंदी गाली सुन कर मुँह में ऊंगलियाँ दे लीं।
एक औरत ने बच्चे को अपने पास बुलाया।
अरे बात सुन! कहाँ से सीखी तूने ये गाली?
बस सीख ली।बच्चा मचलता हुआ बोला।
बता तो सही। हमें भी पता चले कि कौन सिखाता है तुझे ये गालियाँ?
उस औरत ने फिर से ज़ोर डालते हुए पूछा।
बच्चा बोला, बस! एक दिन सब्जी में नमक कम था, पापा ने मम्मी को यही गाली दी थी। चाचा किसी से लड़ रहे थे तो यही गाली निकाल रहे थे। मुझे याद हो गई।      
                     -0-

Monday, 2 April 2012

इज़्ज़त


सुखदेव सिंह शाँत

पड़ोसियों के घर के आगे रोज़ शाम कभी कोई स्कूटर वाला आ जाता, कभी कोई कार वाला। कभी कोई साइकिल पर थैला लटकाए आ पहुँचता। कई बार तो दो-दो, चार-चार आदमी एक साथ भी आ जाते।
माता प्रीतम कौर अकसर अपने बेटे जसवंत से शिकायत करती, नौकरी तो बेटे तू भी करता है, पर पड़ोसियों के मोहन की ओर देख। इसकी भला कैसी नौकरी है? कोई न कोई आया ही रहता है। अपने तो कोई आता ही नहीं। उसकी माँ खुशी से उड़ती फिरती है।
बेटा माँ के पास अपना दुःख व्यक्त करता, माँ, इस युग में अध्यापक को कौन पूछता है! कहने को तो हम कौम के निर्माता होते हैं, पर समाज में हमारा मोल एक टका भी नहीं।
और फिर अचानक लड़के की ड्यूटी बोर्ड की वार्षिक परीक्षा में लग गई।
पता नहीं लोग कहाँ-कहाँ से घर पूछ कर उनके आ पहुँचे।
शाम को तो जैसे कतार ही लग गई। प्रीतम कौर के पाँव ज़मीन पर नहीं लग रहे थे। जैसे उसने मोहन की माँ से कोई बड़ा मोर्चा जीत लिया हो।
                           -0-

Monday, 26 December 2011

सबूत


सुखदेव सिंह शांत

पुराने ऋणों को ब्याज में कुछ छूट देकर वसूल करने की मुहिम चल रही थी। इस संबंधी विशेष मीटिंगें हो रही थी।
ऐसी ही एक मीटिंग में एक गरीब और बुजुर्ग कर्ज़दार पेश हुआ।
हाँ बाबा, बताओ तुम इतने वर्षों से पैसे क्यों नहीं चुका सके?अधिकारी ने सवाल किया ताकि ब्याज में छूट के लिए कोई कारण ढूँढ़ सके।
साब जी! पहले तो मेरा जवान बेटा चला गया और फिर मुझे एक बीमारी ने दबोच लिया। घर में और कोई कमाने वाला नहीं था।
अधिकारी ने बुजुर्ग के फटे-पुराने वस्त्रों को गौर से देखा और ज़रद पड़ गए झुर्रिदार चेहरे से कहा, बाबा, तुम्हारे पास बीमारी का कोई सबूत है तो दिखाओ।
बुजुर्ग ने अपनी कमीज़ ऊपर उठाई। पेट पर लगे हुए टाँकों के निशान दिखाता हुआ वह बोला, साब जी! यह देखो, मेरा तो बहुत बड़ा आपरेशन हुआ। पंद्रह-बीस टाँके लगे थे।
अधिकारी झुँझलाकर बोला, बाबा, कमीज़ नीचे कर। हमें तो डॉक्टर का सर्टीफिकेट चाहिए, टाँके चाहे न लगे हों।
और बुजुर्ग को डॉक्टर का सर्टीफिकेट पेश करने के लिए आगे की तारीख दे दी गई।
                             -0-