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Friday, 4 October 2013

उलझा सवाल



सुरिंदर कैले

गरीब संतू के चार बच्चे थे, एक लड़का और तीन लड़कियाँ। पेट पालने के लिए वह सरपंच के सीरी(फसल में हिस्सा लेने वाला नौकर) लगा हुआ था।
लड़का सब से बड़ा है। इस वर्ष डिग्री की परीक्षा दी है। पढ़ने में बहुत होशियार है। इस वर्ष भी अच्छे नंबर लेकर पास होने की उम्मीद है। आगे की उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय में दाखिला लेना चाहता है।
संतू की भी यही इच्छा है कि लड़का आगे पढ़े और अच्छी नौकरी पर लग घर की गरीबी दूर कर दे। कई दिनों से वह सरपंच से बात करने की सोच रहा था। उसे आस है कि सरपंच अवश्य ही उसकी मदद करेगा। आखिर उसने भी तो सारी उम्र उसकी सेवा की है।
एक दिन उसने सरपंच से विनती कर ही दी, “सरपंच सा'ब! अपना जीतू अबकी पंद्रह पास कर लेगा।”
“भई संतू! तेरा लड़का लायक है। पढ़ने में होशियार है। पास तो उसने हो ही जाना है।” सरपंच को भी पूरा विश्वास था।
“अब वह आगे और पढ़ना चाहता है। आपको घर की हालत का तो पता ही है। उसकी पढ़ाई के लिए एक तो मैं पाड़ी बेच दूँगा। बाकी आप मदद कर देना। जीतू भी आपका ही बच्चा है। कुछ बन जाएगा।”
“संतू! तुझे पता ही है, अभी पिछले साल ही तो मेंने लड़की के हाथ पीले किए हैं। खर्च भी बहुत हो गया। थोड़े-बहुत पैसों की बात होती तो मैं जरूर मदद करता। ऊपर की पढ़ाई का खर्चा तो लाखों में है।”
सरपंच का कोरा जवाब और लाखों के खर्च की सुन, संतू सोच में पड़ गया। उसे पिछले दिनों अखबार में छपी एक ख़बर की याद आई, जो चौपाल में बैठे एक बुजुर्ग ने पढ़ कर सुनाई थी।
“फिर सरपंच सा'ब, आप ऐसे करो कि सरकारी बैंक से कर्जा ले दो। सुना है पढ़ाई के लिए सरकार लंबे समय का कर्जा देती है। नौकरी पर लगके, जीता लौटाता रहेगा।”
संतू को आस थी की सरपंच अगर स्वयं पैसे नहीं देता तो बैंक से कर्ज़ तो दिला ही देगा। परंतु सरपंच का जवाब सुनकर तो वह और उलझ गया।
“संतू! नौकरी कहीं धरी पड़ी है, जो जा कर उठा लेनी है। पढ़े-लिखे नौजवान डिग्रियाँ उठाए जूते घिसाते फिरते हैं। नौकरियां तो दलितों को ही नहीं मिलती, जाटों को किसने देनी हैं?”
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Tuesday, 7 August 2012

किराए का मकान


सुरिंदर कैले

शरनजीत का बचपन से ही एक सपना था–अपना मनपसंद घर।
बचपन से जवानी और जवानी में शादी हो जाने पर उसका सपना बार-बार उसके मस्तिष्क में दस्तक देता रहा। वह और उसका पति अपना घर बनाने के लिए एक-एक पैसा जोड़ने की कोशिश करते, पर बैंक-बैलैंस वहीं का वहीं रहता। बच्चों का पालन-पोषण, पढ़ाई, शादी आदि के खर्चों ने उन के हाथ बाँध कर रखे। वे मकान तो बदलते रहे, पर घर नसीब न हुआ। किराए के मकानों में उन्हें तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता। इसलिए किराए के मकान उन्हें कभी भी घर न लगते।
वह सोचती– अपने घर में मैं मनपसंद रंग करवा सकूँगी। जिस दीवार पर चाहूँ कील गाड़ कर तस्वीर टाँग सकूँगी। आवश्यकता अनुसार अलमारियाँ, खुली रसोई व बाथरूम बनवा सकूँगी। और तो और अपने घर में अपनी मर्जी के अनुसार रह सकूँगी, जो चाहे करूँगी। ऊँचा बोलूँगी, शोर और धमाचौकड़ी मचाऊँगी। कोई मुझे रोकने-टोकने वाला नहीं होगा। मकान मालिक की बंदिशों से मुक्त मैं अपनी मर्जी की मालिक होऊँगी।
शरनजीत अपने बनाए नए और सुंदर घर के लॉन में चहल कदमी करती बचपन के सपने को याद कर रही थी। यह घर रिटायरमेंट पर मिले पैसों से ही संभव हो सका था। पर वह संतुष्ट नहीं थी। बच्चों की जिद्द के आगे उसे कई जगह समझौता करना पड़ा था। फिर भी वह खुश है कि नया मकान उसके अपने घर जैसा लगता है। नरम-नरम घास पर चहल कदमी करना उसे अच्छा लगता है। वह मानसिक खुशी में मस्त थी। इसी मस्ती के आलम में उसने एक गीत का मुखड़ा ऊँची सुर में गाना शुरु कर लिया।
“मम्मी, प्लीज चुप करो!” भीतर से उसके बेटे ने चीखते हे कहा, “शोर सुनकर मुन्नी जाग जाएगी।”
वह चुप कर गई। उसके भीतर एक टीस-सी उठी, मेरा गाना भी बच्चों को शोर लगता है।
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Saturday, 4 February 2012

सबक


सुरिंदर कैले

दीनदयाल के बेटे रतनपाल की तीसरी सगाई की बात चल रही थी। पहिले दो बार सगाई टूट जाने के कारण वह इस बार बहुत चौकस था। पहिले जो कुछ हुआ उससे सबक ले पाँव फूँक-फूँक कर रख रहा था।
“लड़का पढ़ा-लिखा है और सरकारी नौकरी में भी है। अपने परिवार और लड़के की नौकरी के स्टेट्स के अनुसार दहेज ज़रूर लेना है। हमारे घर टी.वी., फ्रिज़, ए.सी., कार वगैरा सब है, इसलिए दहेज में नकद रकम ही चाहिए।” दीनदयाल ने अपने जीवन-स्तर को बयान करते हुए दहेज की माँग रख दी।
“ठीक है, जैसी आपकी इच्छा। हम सामान न देंगे, नकद पैसे दे देंगे, बात तो एक ही है।”
लड़की वालों ने सोचा, लड़का सुंदर है, पढ़ा लिखा है और अच्छी नौकरी पर भी लगा है। घर भी देखने योग्य है। क्या हुआ अगर लड़के का बाप जरा लालची है। एक बार खर्च कर अगर लड़की सुखी रहती है तो नकदी देने में भी कोई हरज नहीं है। बातचीत के बाद फैसला हुआ कि लड़की वाले दहेज के रूप में पाँच लाख रुपये नकद देंगे।
निश्चित दिन पर दीनदयाल लड़के की बारात लेकर लड़की वालों के घर पहुँच गया।
“जल्दी करो। लड़के को फेरों पर बिठाओ, लग्न का समय निकलता जा रहा है।” पंडित जल्दी कर रहा था।
“पहले दहेज की रकम, फिर फेरे।”
दीनदयाल पहले नकदी लेने पर अड़ गया। लड़की वालों ने रुपयों का बैग पकड़ाया तब शादी की रस्में शुरु हुईं।
समधियों से बारात की अच्छी खातिरदारी करवा, डोली लेकर मुड़ने लगे तो दीनदयाल ने रुपयों वाला बैग लड़की के पिता को पकड़ाते हुए कहा, “यह लो अपनी अमानत। आपका माल आपको लौटा रहा हूँ।”
 लड़की का बाप घबराकर दीनदयाल के मुँह की ओर देखने लगा। वह डर रहा था कि यह लालची व्यक्ति अब कोई और माँग रखना चाहता है।
दीनदयाल ने स्थिति को स्पष्ट करते हे कहा, “मेरे बेटे की सगाई दो बार टूट चुकी थी। कारण एक ही था कि मैं दहेज रहित शादी करना चाहता था। इससे लड़की वालों को यह संदेश गया कि शायद लड़के में कोई नुक्स है। इसले सगाई टूट गई। मैं तीसरी बार सगाई टूटने नहीं देना चाहता था। इसलिए ही मजबूरी में मुझे दहेज माँगना पड़ा। अब शादी हो चुकी है, इसलिए मैं दहेज लौटा रहा हूँ।”
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Wednesday, 20 April 2011

बौना


सुरिंदर कैले
“तू कितने दिनों से कह रही थी कि मशीन ठीक करवा दो। आज तो जैसे भगवान खुद ही आ गया। यह देख, घर-घर पूछता फिरता मिस्तरी अपने भी आ गया।”
डॉक्टर के पीछे एक बुजुर्ग कारीगर धीरे-धीरे साइकिल खींचता हुआ आ रहा था। उसने साइकिल दीवार के साथ खड़ा किया और अपने औजारों वाली संदूकड़ी कैरियर से उतार कर एक ओर बैठ गया।
“डॉक्टर साहब! आपके गाँव से दो मरीज आए हैं दवाई लेने और ये भुट्टे लाएँ हैं बच्चों के लिए।” कम्पाउडर ने सूचना दी और भुट्टे रसोईघर में रखने चला गया।
डाक्टर का जन्म व पालन-पोषण एक गाँव में हुआ था। पढ़ाई में होशियार होने के कारण, उसके पिता ने उसकी पढ़ाई पर पूरा ज़ोर लगा दिया था, यहाँ तक कि अपना मकान भी रहन रख दिया था। डॉक्टर ने पढ़ाई पूरी कर गाँव में ही दुकान खोल ली थी, पर मरीज कम होने के कारण वह शहर आ गया था। शहर में उसका काम अच्छा चल पड़ा था। उसने न केवल रहन पड़ा मकान ही छुड़वा लिया था बल्कि एक कोठी भी बना ली थी।
“बीबी! मशीन तो काफी पुरानी लगती है?” मशीन के पुर्जों की जांच करते हुए मिस्तरी ने कहा।
“मेरे दहेज की है। इसका कभी-कभार काम पड़ता है, इसलिए पड़ी-पड़ी जाम हो गई।”
“बीबी! तुम्हारा गाँव कौनसा है?”
“डॉक्टर साहब का गाँव तो नंदगढ़ है, नंदगढ़ पशौरा। मेरे मायके बेगोवाल हैं।
“कौनसा बेगोवाल? दोराहे वाला?”
“हाँ। मैं नंबरदार चानन सिंह की पोती हूँ।”
“मेरा गाँव भी बेगोवाल ही है। मेरे पिता नत्थू राम की नंबरदार जी से अच्छी दोस्ती थी।”
“मैं छोटी-सी थी जब पिता जी स्वर्गवास हो गए थे। मैं ज्यादा ननिहाल में ही रही। इसलिए गाँव के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं।” डाक्टरनी ने उसे न पहचान पाने की मजबूरी बताई।
“बताने से ही पता चलता है। नहीं तो चाहे कोई पास बैठा रहे, क्या पता लगता है कि कौन है। ले बहन, मशीन तो तेरी ठीक हो गई।” मिस्तरी ने पुराने कपड़े से हाथ पोंछते हुए कहा।
“कितने पैसे बाबा?” डॉक्टरनी ने मोहभरी आवाज में पूछा।
“तुम तो मेरे गाँव की हो। मैं बहन से पैसे कैसे ले सकता हूँ।”
डॉक्टरनी ने बहुत जोर लगाया, पर मिस्तरी ने मेहनताना लेने से बिल्कुल इनकार कर दिया।
डाक्टरनी ने दवाखाने से वापस आ रहे डॉक्टर को खुशी, सम्मान और अपनत्व भरे मन से कहा,“यह देखो जी! बाबा पैसे नहीं लेता। मेरे मायके का है न इसलिए।”
यह सुनते ही डॉक्टर को पसीना आ गया। उसके लिए खड़ा रहना मुश्किल हो गया और वह धड़ाम से पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। मिस्तरी के सामने वह अपनेआप को बौना महसूस कर रहा था। बच्चों के लिए भुट्टे लाने वाले अपने गाँव के मरीजों को वह सैंपल वाली दवाइयाँ भी बेच आया था।
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Monday, 5 April 2010

आसरा



सुरिन्द्र कैले

उम्र भर की नौकरी से पैसै-पैसा जोड़, उसने बढ़िया कोठी बनाने की तमन्ना पूरी कर ली। नौकरी से निवृत्त होने के पश्चात वह उस कोठी में रहने लगा। पेंशन घर का खर्च पूरा नहीं कर पाती थी। शहर से मिलने आए बहू-बेटे को अपनी आर्थिक-तंगी के बारे में बताते हुए उसने सहायता की आस की।
“पिताजी, बड़े शहर के खर्चों का तो तुम्हें पता ही है। बड़ी मुश्किल से गुजर होती है, नहीं तो मैं कुछ न कुछ जरूर भेजता रहता।” बेटे ने असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा, “हाँ, अगर आप यह कोठी किराये पर दे दो और खुद पीछे बने दो कमरों में रिहायश कर लो तो कम से कम चार हजार रुपये महीने की आमदन हो सकती है।”
“मैं ऐसा नहीं कर सकता। बढ़िया कोठी में रहने की रीझ का गला नहीं घोंट सकता।” वह कोठी किराये पर देने को तैयार नहीं था।
“ऐसा करने से आपकी सभी चिंताएं समाप्त हो जाएंगी।” बहू ने पति की बात का समर्थन किया।
उसने ‘न’ में सिर हिलाया तथा शयन-कक्ष में चला गया।
अगले दिन बहू-बेटा दिल्ली चले गए।
उसने सोच-विचार किया तथा कोठी किराये पर चढ़ा दी।
“तुम उदास क्यों हो? अब अपने को कोई फिक्र नहीं। किसी के मुँह की ओर देखने की जरूरत नहीं, चिंता दूर हो गई।” सर्वेंट क्वाटर में सामान टिकाते हुए पत्नी ने दिलासा दिया।
“बुढ़ापे में बच्चे सहारा न दे सके, इस बेजान कोठी ने आसरा दे दिया।” उसने सहमत होते हुए कहा।
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