Showing posts with label गुरचरण चौहान. Show all posts
Showing posts with label गुरचरण चौहान. Show all posts

Saturday, 8 February 2014

बदलते रिश्ते



गुरचरण चौहान

हाकम सिंह के बड़े बेटे नछत्तर की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। जवानी में हुई इस मौत से घर में मातम छा गया था। उसकी जवान पत्नी, औरतों की पकड़ से निकल-निकल लाश के ऊपर गिरती छाती पीट रही थी।
लाश का अंतिम संस्कार हो गया। तीसरे दिन अस्थियां चुगी गईं। अस्थियां चुगवाने आए नछत्तर की ससुराल से एक बुजुर्ग ने हाकम सिंह से बात चलाई, हाकम सिंह जी, हमारी बेटी के लिए तो अब जग में अँधेरा ही अँधेरा है…पहाड़-से जीवन के लिए कोई तो आसरा चाहिए…कहो तो दशहरे के दिन हम छोटे बेटे के लिए पगड़ी ले आएँ…विचार कर लेना…रब का भाना मान कर दोनों बेटियाँ एक ही चुल्हे पर रोटी खा लेंगी…।
कोई बात नहीं, हमारी ओर से तो कोई एतराज नहीं…।हाकम सिंह ने नछत्तर के ससुराल वालों को धीरज बँधवाया।
माता-पिता ने नछत्तर से छोटे स्वर्ण को राजी कर लिया। परंतु स्वर्ण की पत्नी के पास जब यह बात पहुँची तो उसने घर में तूफ़ान खड़ा कर दिया। उसकी पत्नी कर्मजीत ने तो एक ही रट लगा रखी थी, कुछ हो जाए, मैंने ये नहीं होने देना। मैं अपने साईं को कैसे बाँट लूँ…।
कर्मजीत के इस निर्णय से उसके मायके वालों की भी सहमति थी।
दशहरे का दिन आ गया। कर्मजीत को मनाने के सभी प्रयास विफल रहे। आँगन में सोग प्रकट करने वालों से अलग होकर हाकम सिंह, उसकी पत्नी, स्वर्ण, कर्मजीत और नछत्तर व स्वर्ण के ससुर अभी भी इस मसले का हल ढूँढ़ने का प्रयास कर रहे थे। परंतु कर्मजीत अपने फैसले पर अड़ी हुई थी।
बात सुन लो भई सभी…मैं करूँगा ज़मीन के तीन हिस्से…एक हिस्से की ज़मीन दूँगा स्वर्ण को…नछत्तर का और मेरा हिस्सा होगा अलग…मैं तो नहीं चाहता था कि ज़मीन बंटे…चाहता था कि सारी का मालिक बने स्वर्ण…पर अब जब तुम्हारी अड़ी ही है तो अब मेरी भी अड़ी देखना…।लाठी के सहारे खड़े होते हुए हाकम सिंह ने अपना निर्णय सुनाया।
स्वर्ण के ससुराल वालों के मुँह खुले के खुले रह गए। वह कर्मजीत को समझाने लगे। ज़मीन बाँटने वाली बात ने सबको हिला दिया।
भोग पड़ जाने के बाद नछत्तर की ससुराल वाले स्वर्ण के पगड़ी बँधवा कर चले गए।
                         -0-

Tuesday, 5 November 2013

ढह रहे बुर्ज



गुरचरण चौहान

ड्योढ़ी में बैठा सरमुख सिंह बीस वर्ष पहले की स्मृतियों में खो गया उसके पिता जवंद सिंह बराड़ इलाके के बहुत ही आदरणीय व्यक्ति थे। थाने से लेकर कचहरी तक में उन्हें बैठने के लिए कुर्सी मिलती थी। सरमुख सिंह की आँखों के आगे जवंद सिंह आ खड़ा हुआ, जैसे कल की बात हो। बैठक के आगे बने पक्के चबूतरे पर मोंढे के ऊपर बैठा जवंद सिंह। वह अपनी छड़ी चबूतरे पर मारता हुआ सामने बैठी संगत को कहता, हम सिद्धू बराड़ हैं, बाबा आला सिंह के खानदान से। पटियाला के महाराज हमसे लगान नहीं वसूलते। वे कहते हैं सिद्धू बराड़ मेरी बिरादरी वाले हैं…।
आज सुबह उसके बेटे के मुँह से निकली बात उसका कलेजा चीर गई, बापू, बता तूने क्या टींडे लेने हैं हमारे काम से? तेरी फोकी सरदारी को हम क्या चाटें!…कहता, दुकान का नाम ‘बराड़ बूट हाऊस’ क्यों रखा…खेतीबाड़ी में अब क्या पड़ा है…मुझसे बड़े तीन खेती कर क्या घर नोटों से भर रहे हैं!…
सेम की मार से पिछले सात-आठ साल से उनके घर को तो जैसे ग्रहण लगा था। सरमुख सिंह के भीतर बसे जाट को कमज़ोर आर्थिकता ने तबाह कर दिया था, पर फोके अहं ने उस के मुख से छोटे बेटे को कहा दिया था, न अब तू छोटी-जाति वाले काम करेगा…लोगों के पैरों में जूतियाँ…
इसमें क्या बुरा है? व्यापार तो व्यापार है…और ये रहे दुकान के मुहुर्त के निमंत्रण-पत्र, जिसे देने हों दे देना। बेटा उसके पास निमंत्रण-पत्र रख कर चला गया। उसके भीतर का जाट सारा दिन उसके दिमाग में उथल-पुथल मचाता रहा कि वह निमंत्रण-पत्र बाँटे या नहीं।
दिन छिपने के साथ ही सरमुख सिंह अनमना-सा उठा और अपने लँगोटिया-यार जमीत सिंह नंबरदार के घर की ओर चल दिया। जमीत सिंह ने सारी उम्र जायज़-नाजायज़ हर काम में उसका साथ दिया। नीम के पेड़ के नीचे बैठे जमीत सिंह को सुबह बेटे के साथ हुई तकरार की बात बता, वह हल्का महसूस कर रहा था।
सरमुख, अब तो चुप ही भली। अपना ज़माना अब लद गया…जमीत सिंह ने गहरी साँस ली।
नंबरदार, तू भी…!सरमुख सिंह हैरान-परेशान नंबरदार को एकटक देखेता रहा।
चारपाई से उठते हुए सरमुख सिंह ने अपनी फ़तूही की जेब से दुकान के मुहुर्त का निमंत्रण-पत्र निकाल नंबरदार को पकड़ाया और बोझिल कदमों से अपने घर की ओर चल पड़ा।
                           -0-




Tuesday, 12 February 2013

बिरादरी



गुरचरण चौहान

ताँगेवाले ऊड़ी व जूली का आज फिर झगड़ा हो गया। सुबह गाँव में हुए फैसले के अनुसार, ताँगे की पहली फेरी आज जूली को ले जानी थी। पर जूली के घर में क्लेश के चलते वह अड्डे पर जरा देर से आया। उसके आने से पहले ऊड़ी ने अड्डे पर खड़ी सवारियाँ अपने ताँगे पर बैठा लीं। जब जूली अपना ताँगा लाया तो वह ऊड़ी के गले पड़ गया।
“आज पहली फेरी लगाने की बारी मेरी थी, तू कैसे?” ऊड़ी की रग-रग में गुस्सा बोल रहा था।
“अगर तू बारह बजे तक घर सोया रहेगा तो मैं तेरा इंतजार करता रहूँगा!
बात ‘तू-तू, मैं-मैं’ से होती हुई आगे बढ़ गई। ऊड़ी ने जूली को गले से पकड़ लिया। अड्डे पर खड़े लोगो ने उन्हें छुड़ाया और सवारियाँ ऊड़ी के ताँगे से उतरवा कर जूली के ताँगे में बिठा दीं।
कुछ देर बाद एक ऑटोवाला शहर से आया और गाँव में सवारियाँ उतार कर अड्डे पर आ खड़ा हुआ। ऑटोवाला जूली के ताँगे पर बैठी सवारियों को इशारे से ऑटो में बैठने के लिए उकसाने लगा।
“हम तो अभी चले हैं, दस मिनटों में मण्डी…आओ बैठो।” वह ऑटो को रेस पर रेस दिए जा रहा था।
जूली तो अभी खड़ा सोच ही रहा था, पर ऊड़ी ने भागकर फुर्ती से ऑटोवाले को बाहर घसीट लिया और उस पर साँटा बरसाने लगा। लोगों ने उसे बहुत मुश्किल से हटाया।
“यूँ ही दिमाग हिला हुआ है…पहले जूली से लड़ा और अब टैम्पू वाले के गले पड़ गया।” बिशनी दूसरी सवारियों को कह रही थी।
“ताई, अगर ये टैम्पू वाले यूँ ही हमारी सवारियों को ले जाने लगे तो हमारा क्या बनेगा? जूली से तो मैं फिर भी निपट लूँगा।” ऊड़ी ताँगे के पायदान पर पाँव रखता हुआ कह रहा था।
ऑटोवाला कब का शहर को रवाना हो चुका था।
                        -0-


Saturday, 16 July 2011

हमने क्या लेना

गुरचरण चौहान


मैं और रणजोध सिंह निहंग हमारे गांव के साथ लगते गाँव फकरसर पिण्डी साहिब में लगते बैसाखी के मेले में पहुँचे ही थे कि समाधियों की ओर शोर-शराबा मच गया। जब मैं तथा रणजोध सिंह समाधियों की ओर गए तो पता लगा कि कुछ आवारा लड़कों ने माथा टेक रही लड़कियों से कोई गलत हरकत की थी। रणजोध सिंह आपे से बाहर हो गया, पकड़ लो इन मुस्टंडों को…कुत्ते के बीज…ठहरो तुम्हारी…।
रणजोध ने कमरबंद कमर पर कस लिया था। लड़के अपने मोटर-साइकिल पर बैठ भाग लिए थे।
चल छोड़, हमने क्या लेना…।मैंने निहंग का कड़े वाला हाथ पकड़ लिया था।
हम सारा दिन मेले में घूमते रहे। निहंग के माथे पर पड़ी त्योरियां सारा समय विष घोलती रहीं।
दिन ढ़ले तालाब की तरफ फिर शोर मचा। निहंग मुझे भीड़ में छोड़ तालाब की ओर दौड़ गया। भीड़ से बचता-बचाता मैं किसी तरह शोर-शराबे वाली जगह पहुँचा। नहाने वाली जगह पर एक निहंग ने किसी औरत से अश्लील हरकत की थी। नंगी तलवार ऊपर उठा ललकारे मारता रणजोध सिंह, उस निहंग के चारों ओर चक्कर लगा रहा था।
मैंने फिर रणजोध की तलवार वाली बाँह पकड़ ली, छोड़ परे निहंग, हमने क्या लेना…!
इन पाखंडियों ने ही तो पंथ को बदनाम किया है…छोड़ दे मुझे मास्टर…अगर कलगीधर दशमेश-पातशाह भी ‘हमने क्या लेना’ वाली बात सोचते तो आज हमारा इतिहास कुछ और ही होना था।
मुझे लगा जैसे मेरी रूह मुझमें से मनफ़ी हो गई है।
                        -0-