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Wednesday, 4 September 2013

अपने हिस्से का दुःख



नूर संतोखपुरी

रात काफी बीत चुकी थी। गरीब बंते के परिवार के सभी सदस्य आपस में बातें कर रात गुजार रहे थे। गाँव की गलियों में आवारा कुत्ते भौंक-भौंक कर जैसे सोए हुए गाँव को जगाने की कोशिश कर रहे थे। ऐसा कर वे शायद बंते के दुःख में शामिल हो रहे थे।
“जब नंबरदारों का बूढ़ा मरा, उस समय बहुत-से औरत-मर्द इकट्ठे हुए थे। उन के घर तिल रखने तक को जगह नहीं थी बची। संस्कार से पहले भी काफी लोग उन के घर रुके रहे थे। मैं भी वहीं थी।” बंते की पत्नी ने कहा।
“बड़े सरदारों की माँ की अर्थी ले जाने के वक्त कितने लोग थे! गाँव से लेकर श्मशान तक लोग ही लोग थे, जैसे लोगों की बाढ़ आ गई हो। और देख लो, हम अकेले बैठे हैं।” बंते ने गहरी साँस लेते हुए कहा।
“सरपंच रेशम सिंह का बड़ा भाई जब हार्ट अटैक से मरा था, तब भी अपने गाँव में मेला-सा लग गया था।” बंते का अठारह वर्षीय बड़ा बेटा जगतार बोला।
सोलह वर्षीय छोटा लड़का सोनू, कुछ खास नहीं बोल रहा था। वह कच्चे फर्श पर पड़ी अपने दादा चरने की लाश की ओर लगातार देखे जा रहा था। परिवार के बाकी सदस्यों की तरह रो-रोकर उसकी आँखों में से भी जैसे पानी सूख गया था।
कुछ दिन बीमार रहने के बाद, शाम साढ़े-सात बजे चरना प्राण त्याग गया था। बंते व परिवार का रुदन सुन कर कुछ लोग छोड़ी देर के लिए उनके पास आ बैठे थे। फिर सब अपने-अपने घरों को चले गए थे। चरने का संस्कार अब रात को तो हो नहीं सकता था, इसलिए परिवार अकेला बैठा दिन चढ़ने की प्रतीक्षा कर रहा था।
गाँव के कुत्ते बंते के घर के बाहर भौंकने से नहीं हट रहे थे। उन्हें अपने हिस्से की रोटी तक खिला देने वाला चरना, अब नहीं रहा था। शायद इसीलिए वे रोने जैसी आवाज़ में भौंक-भौंक कर अपने हिस्से का दुःख प्रकट कर रहे थे।
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Saturday, 10 October 2009

एक राह और


नूर संतोखपुरी

वह मेरे आगे-आगे चली जा रही थी। गले में पड़ी हलके लाल रंग की चुनरी के दोनों छोर मेरी ओर देख कर हंस रहे थे। बालों की एक ही चोटी इस तरह गुंथी हुई थी, जैसे किसी ने बलखाती बेल कोरे सफेद कागज पर बड़ी रीझ से बनाई हो। उसके कानों की सुनहली बालियां हिलती हुई मंद-मंद मुस्करा रही थीं। उसकी चाल ऐसी थी, जैसे कोई किसी अजीब खुशबू से नहाया हुआ फूलों की घाटी में से चला जा रहा हो। मैं उसके पीछे-पीछे चलता अपने ही ख्यालों में डुबकियाँ लगाने लग पड़ा था।

वह एकदम रुक गई। मेरे कदम भी ठहर गए। शादी वालों ने चाँदनी-कनात लगा कर राह बंद किया हुआ था। दाहिनी ओर आलुओं की हरी बेलें इधर-उधर देख रही थीं। बाईं ओर खिलने की उम्र को पहुँची हरी कचनार गेहूँ के पौधे एक दूसरे से हंसी-ठट्ठा कर रहे थे। इन फसलों को कुचलकर शायद वह जाना नहीं चाहती थी। पीछे मुँह घुमा कर रोशन चेहरे वाली उस प्रौढ़ा ने मेरी ओर देखा तथा बोली, “बेटा, आगे तो राह बंद है। अब क्या करें?”

“……” मुझसे कुछ न बोला गया। मैं चुप रहा।

वह पीछे मुड़ी और साथ ही मुझे भी मुड़ने का इशारा करती हुई बोली, “एक राह और भी है। मुझे पता है उस राह का। उधर से होकर हम सड़क पर पहुँच सकते हैं। तुमने भी उधर ही जाना है?”

“हाँ माँ जी।” मैने कहा।

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