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Friday, 8 May 2015

काँटे



मंगत कुलजिंद

शुक्र है भगवान का, बच्चे को समय पर डाक्टरी सहायता मिल गई, नहीं तो पता नहीं…मित्र का धन्यवाद करते हुए बलदेव घर से अस्पताल तक के सफर को याद कर काँप उठा।
बलदेव के बारह वर्ष के बेटे को अचानक दौरा पड़ गया था। वह बेटे को कार में डाल पत्नी समेत अस्पताल की और भागा। मुख्य सड़क पर आकर गाड़ी भीड़ में फँस गई। पीछे मुड़ने को भी राह नहीं था। बहुत हार्न बजाया, लोगों की टांगों-टखनों से गाड़ी का बंपर भी लगा दिया, लोगों को गालियाँ भी दीं, पर किसी ने राह नहीं दिया। पीछे सीट पर बेटे को लिए बैठी पत्नी रो रही थी और ‘जल्दी चलो, जल्दी चलो!की गुहार लगा रही थी।
मुख्य सड़क के बीच में बनी ‘नीम वाले बाबे की समाधि’ पर लोगों की भारी भीड़ जुटी थी। कुछ लंगर की रोटी खाने के लालच में, नौजवान खरमस्तियाँ करने को और औरतें अधिकतर धन-दौलत, सुख-सुविधाएँ व औलाद की प्रप्ति की तमन्ना ले कर आईं थी। प्रत्येक वीरवार को यहाँ यूँ ही भीड़ जुटती है। पहले-पहल नगर निगम ने दो-तीन बार इस समाधि को यहाँ से हटाने की कोशिश की थी। पर कुछ लोगों के विरोध व राजनैतिक लोगों के दखल के कारण सफलता नहीं मिल पाई।
इस मुसीबत की घड़ी में उधर से गुज़र रहे बलदेव के मित्र ने लोगों को इधर-उधर कर कार के लिए राह बनाया तथा बच्चे को अस्पताल पहुँचाया।
यार…लोग तो वैसे ही पागल हुए फिरते हैं…भेडें किसी जगह की!…सालो सड़क तो न रोको…।बलदेव अभी भी मन का गुबार निकाल रहा था।
सब से बड़ा पागल तो तू ही है। याद कर, किसी समय मैंने तुम्हें कहा था कि सड़क के बीच में बन रही यह समाधि एक दिन लोगों की जान की दुश्मन बन जाएगी।जैसे ही मित्र ने कहा बलदेव को याद आ गया कि बारह साल पहले उसने समाधि पर चढ़ावा चढा कर समाधि बनाने में योगदान दिया था।
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Monday, 2 July 2012

भ्रूण-हत्या


                     
मंगल कुलजिंद

डॉ. मित्तल, मेरी जमीर नहीं इज़ाज़त देती कि उल्टे-सीधे काम करके तिजोरियाँ भरी जाएँ।
डॉ. प्रेम! नहीं चलता, हम जिस समाज में रेंग रहे हैं, वहाँ पैसा ही सब कुछ है।
मैं नहीं मानता यार, सभी लोग पैसे के गुलाम नहीं होते।
क्षेत्र के प्रसिद्ध कालिज के परिसर में दोनों डॉक्टर दोस्त बातें कर रहे थे। वे बहुत समय बाद मिले थे। बातों का सिलसिला पैसे की महानता पर आकर अटक गया था। डॉ. प्रेम की बात का जवाब देते हुए डॉ. मित्तल ने कहा, तेरे मानने या न मानने से क्या होता है! ये लैक्चरार की पोस्ट के लिए होने वाले अपनी बेटियों के मुकाबले में ही देख लेना।
डॉ. प्रेम भावुक हो गया, यार इस नामी कालिज में लग कर बच्चों को ज्ञान बाँटने का मेरी बेटी का बड़ा अरमान है।
अरमान तो मेरी बेटी का भी है। डॉ. मित्तल ने जवाब दिया।
डॉ. प्रेम दृढ़ता से बोला, लेकिन मुझे अपनी बेटी की योग्यता पर पूरा भरोसा है, यह पोस्ट उसे ही मिलेगी।
अच्छा…! डॉ. मित्तल के चेहरे पर वयंग्यमयी मुस्कान फैल गई।
तुम सलैक्शन-कमेटी के किसी सदस्य से मिले हो? किसी मनिस्टर से फोन करवाया है? किसी सदस्य को गिफ्ट दिया है?
न ही गिफ्ट दिया है और न ही देना है।डॉ. प्रेम की ज़मीर की आवाज़ थी।
तो जा फिर घर!डॉ. मित्तल ने एक तरह से आदेश ही सुना दिया।
क्यों?
क्योंकि तुम्हारी बेटी के इस अरमान-रूपी भ्रूण की हत्या करने के लिए कमेटी के सदस्यों ने मेरे गिफ्ट कबूल कर लिए हैं।डॉ. मित्तल के चेहरे पर विजयी मुस्कान थी।
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Monday, 19 December 2011

तबदीली


मंगत कुलजिंद

कैनेडा से परिवार सहित छुट्टियाँ व्यतीत करने अपने गाँव आए कुलदीप ने शहर से बाहर जी.टी. रोड पर कार रोक ली।
अब क्या हो गया, क्यों रोक ली यहाँउसकी माँ प्रसिन्नी ने हल्के-से क्रोध के साथ बहू से पूछा।
ममा, वे सामने स्टोर से वाइन लेने गए हैं, घर पर बिल्कुल ख़तम थी׆
शराब के ठेके के आगे एक बड़ी-सी पेंटिंग लगी थी। जिसमें दो लगभग नग्न लड़कियाँ एक नौजवान को शराब का पैग दे रही थीं। उसे देखते हुए कुलदीप की नौ वर्षीय बेटी किस्स ने अपनी माँ को झँझोड़ते हुए कहा, वाह! मौम, क्या ब्यूटीफुल पेंटिंग है सामने! देखो न दो ब्यूटीफुल लेडीज और एक हैंडसम ब्वाय, जंगल में इन्जवाए कर रहे हैं…।
यैस बेटा! देखा पंजाब में भी अब ऐसी पेंटिंग्ज मिलती हैं।
पर मौम, इस में एक प्राबलम है, वे जो पेड़ की डालियाँ इनकी बॉडीज पर पड़ रही हैं न, उन से ये भद्दी लग रही हैं। पेड़ों को ऐसा नहीं करना चाहिए था।
किस्स की मम्मी कुछ बोलती, इससे पहले ही प्रसिन्नी की नज़र उस पेंटिंग पर पड़ गई। मन में कुछ हीनता महसूस करते हुए  उस ने कहा, नहीं बेटा, उन वृक्षों ने कुछ गलत नहीं किया। वे तो औरत के जिस्म की भद्दी नुमाइश देख कर शर्म से पानी-पानी हो झुक गए हैं।
किस्स को कुछ समझ लगी या नहीं, पर उसकी माँ ने मन में दुहराया, ‘ये बुढ़िया ज़माने के अनुसार नहीं बदलेगी।
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