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Friday, 2 May 2014

प्रश्नचिह्न



विवेक

यहीं तो रखी थी, किधर गई?राम शरण ने अलमारी के खानों में ऊपर-नीचे हाथ मारते हुए अपने-आप से कहा। भूख से शायद उसके पेट में थोड़ा दर्द भी हो रहा था। ऊपर से ज़िंदगी का अंतिम पहर। उस ने फिर से रोटी ढूँढ़ने की कोशिश की। रात की बची एक रोटी उसने सुबह के लिए सँभाल कर रख ली थी।
राम शरण अक्सर ही रात के भोजन में से एक रोटी बचा कर अलमारी में रख लेता था। सभी ओर देख कर भी उसे रोटी न मिली। अंततः बेहाल अवस्था में वह चारपाई पर बैठ गया।
दादा जी, आप क्या ढूँढ़ रहे थे?उसके सात वर्षीय पोते ने पूछा।
बेटे, यहाँ अलमारी में एक रोटी रखी थी, पता नहीं कहाँ गई?राम शरण ने परेशानी की हालत में अपने पोते से कहा।
वह रोटी तो मैंने खाली। साथ ही मम्मी को भी कह दिया कि दादा जी की अलमारी में रोटी पड़ी थी। मम्मी कहती, अब तेरे दादा जी को फालतू रोटी नहीं देनी, खाते तो है नहीं, यूँ ही सँभाल कर रख देते हैं।
बेटे, तू रोटी खा लेता, पर अपनी मम्मी को न बताता। मुझे तो पहले ही रोटी कम मिलती है। मैं तो रोटी बचा-बचा कर खाता हूँ।रोटी की कमी और उदासी प्रश्नचिह्न बन कर राम शरण के चेहरे पर लटक गईं।
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Tuesday, 22 October 2013

विडंबना



विवेक

पापा जी, आप ऐसे न बोला करो।सुभाष ने झुँझलाते हुए अपने बुजुर्ग पिता देसराज से कहा।
अब मैंने ऐसा क्या कह दिया?बेटे के गर्म स्वाभाव से परिचित देसराज ने धीमी आवाज में कहा।
यह ग्राहक बड़े आराम से सौदा ले रहा था, आप बीच में बोल पड़े तो सब कुछ छोड़ कर चला गया।ग्राहक के चले जाने का क्रोध बेटे के माथे की त्योरियों से स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
मैंने तो उसे यही कहा था कि उधार नहीं मिलेगा। तूने पहले ही उससे पैसे लेने हैं।देसराज ने स्पष्टीकरण दिया।
मेरी दुकान है, मैं जो मरजी करूँ। आपका इस दुकान से क्या लेना-देना। आप से कोई काम नहीं होता, न ही आपकी कोई ज़रूरत है। जाओ और घर पर आराम करो।
बेटे की यह बात देसराज को चुभ गई। वह गद्दी से उठा, अपनी लाठी उठाई और ऐनक ठीक करता हुआ घर की ओर चल दिया।
देसराज बड़ी सड़क पर चढ़ा ही था कि एक तेज़ रफ्तार ट्रक ने उसे फेट मार दी। वह वहीं सड़क पर ढ़ेर हो गया। वहाँ शोर मच गया। लोग लाश के आसपास एकत्र हो गए। एक व्यक्ति दुकान से सुभाष को बुला लाया।
अपने पिता की लाश देख, सुभाष ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा, पापा जी, यह क्या हो गया, अभी तो आपकी बहुत ज़रूरत थी।
लोगों से उसका रोना देखा नहीं जा रहा था।
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Wednesday, 20 March 2013

साँझ



विवेक

न मारो मम्मी, न मारो!दस वर्षीय भोलू ने अपनी माँ के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा।
नहीं, मैं तुझे अभी बताती हूं। अब खेलेगा उसके साथ?कहते हुए ऊषा देवी ने डंडा लड़के के टखनों पर मारते हुए कहा।
डंडे की मार से लड़का चीख उठा। ऊषा देवी ने मारने के लिए फिर से हाथ उठाया ही था कि उसके पति कृष्णकाँत शर्मा ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया। पिता को आया देख, बचाव के लिए भोलू उसकी लातों से लिपट गया।
अब किधर जाता है? तुझे कितनी बार कहा, पर तुझ पर कोई असर नहीं।ऊषा देवी फिर भोलू की ओर लपकी।
क्या बात हो गई? क्यों लड़के को मार रही है?सहमे हुए भोलू की पीठ पर हाथ रखते हुए कृष्णकाँत ने पत्नी से पूछा।
होना क्या है, जब देखो मज्हबियों के लड़के के साथ खेलता रहता है। उसकी बाँह में बाँह डाले फिरता है। कभी खुद उसके घर चला जाता है, कभी उसे अपने घर ले आता है…मुझे नहीं ये बातें अच्छी लगतीं…इसे बहुत बार समझाया, पर सुनता ही नहीं। कहता है, वह मेरा दोस्त है…दोस्त ही बनाना है तो अपनी जात-बिरादरी वाला देख ले…।ऊषा देवी ने भोलू को घूरते हुए कहा।
छोड़ ऊषा, यह कौनसी बात हुई। हम भी दिहाड़ी करके खाने वाले हैं, वे भी मज़दूरी करके पेट भरते हैं। बता फिर फर्क कहाँ हुआ? हम भी गरीब, वे भी गरीब। हमारी तो साँझ हुई। जात-बिरादरी ने रोटी दे देनी है! रोटी तो मेहनत-मज़दूरी करके ही खानी है। यूँ ही न लड़के को मारा कर, खेलने दे जिसके साथ खेलता है। 
इतना कह उसने ऊषा देवी के हाथ से डंडा पकड़ कर फेंक दिया।
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