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Sunday, 24 May 2015

नैसर्गिक आनंद



रणजीत आज़ाद काँझला

इंद्र देवता प्रसन्न होकर रिमझिम बारिश से धरती को नहला रहे थे। झोंपड़ियों से बच्चे बाहर निकल कर वर्षा का आनंद उठा रहे थे। वे खुशी में एक-दूसरे को छेड़कर भाग रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे भगवान स्वयं इन बच्चों में प्रवेश कर आनंद ले रहे हों।
सामने की कोठी में से एक बच्चा आया ओर बारिश में नहाने लग पड़ा। जैसे ही बच्चे की माँ की नज़र उस पर पड़ी, वह बोली, “बेटा टिंकू अंदर आ जा। क्यों बारिश में भीग कर गंदा हो रहा है?…आ अंदर आकर अपनी साइकिल चला ले।”
“नहीं मम्मी! मुझे अंदर नहीं आना। मैं तो यहीं बारिश में खेलूँगा। मुझे बड़ा मजा आ रहा है सबके साथ खेलकर। साइकिल तो मैं बाद में भी चला लूँगा।” टिंकू ने बारिश में खेल रहे बच्चों में शामिल होते हुए कहा।
यह सुनकर टिंकू की माँ के चेहरे पर भी मुस्कराहट फैल गई।
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Monday, 13 October 2014

कंजक



रणजीत आज़ाद काँझला

“बहन राम कौर! अपनी छोटी बेटी ममो को कल सुबह जल्दी ही भेज देना, कंजकों को भोजन कराना है। कल अष्टमी जो है।” मुहल्ले में चौथे घर से आई नौरती आवाज दे और कंजकों को निमंत्रण देने आगे को चल पड़ी।
“कोई न बहन! भेज देंगे, सुबह जल्दी ही। फिर इसने स्कूल भी जाना है।” मेरी पत्नी रसोईघर में से हुंकारी भरती हुई बोली।
कंजकों को भोजन खिलाने की बात मेरे कानों तक भी पहुँच गई थी।
“नौरती ने कंजकों को भोजन किस लिए कराना है?”  जानने के लिए मैंने पत्नी से प्रश्न किया।
“वो जी! इसके बड़े बेटे को ब्याहे तीन साल हो गए, पर उसके घर…”
“पर उसके घर क्या? पिछले दिनों इनकी बड़ी बहू ने प्राइवेट अस्पताल में अबारशन तो करवाया है।”
“हाँ। वह तब करवाया जब टैस्ट में लड़की की रिपोर्ट आई थी। इसी लिए एक बार फिर आपरेशन करवाना पड़ा।” स्त्री-जाति की दुश्मन बनी औरत-जीभ बोल रही थी, “ कंजकों को इसीलिए तो भोजन करवाते हैं कि भगवान हमारे घर अच्छी चीज दे।”
मैं गुस्से में गरजा, “इन पापियों के घर अपनी बेटी को भोजन के लिए मैंने नहीं भेजना । मासूम कंजक का तो पेट में कत्ल करवाते हैं, फिर इन्हीं कंजकों को भोजन करवा कर ‘लाल’ चाहते हैं…!”
मेरी खरी-खरी बातें सुन पत्नी मुँह लटकाए रसोईघर में चली गई।
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Saturday, 16 August 2014

ममता




रणजीत आज़ाद काँझला

मैं अपनी बीमार भाभी के बैड के पास बैठा सोच रहा था कि प्राणी का जीवन भी क्या है, जो पलों में पराया हो जाता है। मस्तिष्क में कई तरह के अच्छे-बुरे सवाल उठ रहे थे। अस्पताल में दुखी लोग ही आते हैं, या फिर उनके रिश्तेदार और मित्र।
भाभी के अगले बैड पर एक वृद्धा नीम बेहोशी की हालत में पड़ी थी। मैंने देखा, कुछ पढ़े-लिखे लोग अपनी पत्नियों सहित आए। बातों से पता चला कि वे वृद्धा के बहू-बेटे थे। वे सभी सरकारी नौकरी में थे। माँ के सिरहाने खड़ा साधारण-सा प्राणी कभी वृद्ध माँ का कंबल ठीक करता तथा कभी बेहोश माँ का चेहरा देख, गहरी उदासी में खो जाता।
अँधेरा बढ़ता जा रहा था। वृद्धा के नौकरी करते बहू-बेटे आवश्यक चीजों व दवा आदि के बारे में पूछताछ कर एक-एक कर जाने लगे। एक ने अपनी पत्नी से कहा, “अगर आज की रात मैं माँ के पास रह जाऊँ तो ठीक रहेगा। तीन दिन से माँ के पास बैठा यह भाई अपनी कमर सीधी कर लेगा।”
“ऊँ-हूँ!…भाई साहब हैं न, और ये मां को कभी किसी के आसरे नहीँ छोड़ते।” पत्नी ने आँखों ही आँखों में पति को घूरा।
“नहीं भाई, तुम घर जाओ, यहाँ क्यों बेआरामी काटनी है। मैं हूँ न माँ के पास…।” साधारण से दिखने वाले प्राणी ने जबान खोली।
वे दोनों पति-पत्नी माँ की ओर देखते अस्पताल से बाहर चले गए।
“ये तुम्हारे भाई-भाभी थे?” मैंने उसके उतरे हुए चेहरे को पढ़ते हुए पूछा।
“हाँ…! ये मेरे भाई-भाभी हैं। मैं और मेरी माँ इकट्ठे रहते हैं। बाकी सब बाल-बच्चों सहित अपने अलग घरों में सुखी बसते हैं…।” वह निरंतर बोलता जा रहा था।
“तुम्हारे बाल-बच्चे?” मेंने बीच में टोकते हुए पूछा।
“जी, मेरा तो ब्याह ही नहीं हुआ…।”
“फिर तुम्हारी रोटी कौन बनाता है?” मेंने उसे फिर से सवाल कर दिया।
“यह मेरी माँ। मेरी माँ ही मेरा सब कुछ है।” उसने माँ की ओर हाथ कर गहरा साँस लेते हुए कहा, “मैं थोड़ा-बहुत काम कर लेता हूँ और माँ रोटी बना लेती है…अगर इसे कुछ हो गया तो…!” इतना कह उसका गला रूँध गया और आँखों से आँसू बह चले।
“कोई बात नहीं! फिक्र न करो, तुम्हारी माँ ठीक हो जाएगी। हौंसला रखो। किसी चीज या मदद की की ज़रूरत हो तो बताना, मैं यहीं हूँ।” मैंने उसका साहस बढ़ाने के लिए कहा।
“सरदार जी! अगर मेरी माँ को कुछ हो गया तो…तो मैं भी…।” उसने काँपती आवाज में अपनी पगड़ी के छोर से आँखें पोंछते हुए कठिनाई से कहा।

उस अनब्याहे बेटे की आँखों से माँ की ममता के छिन जाने का भय साफ दिखाई दे रहा था।
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