Showing posts with label निरंजन बोहा. Show all posts
Showing posts with label निरंजन बोहा. Show all posts

Saturday, 6 September 2014

संबंध



निरंजन बोहा




अपनी बहन की सहेली रीमा उसे अच्छी लगती। जब वह उस की बहन के पास बैठी होती तो वह बहाने बना वहाँ चक्कर लगाता रहता। रीमा भी उसकी चोर-निगाह का ध्यान रखने लग पड़ी थी। लेकिन वह सदा अपनी आँखें नीचे झुकाए रखती।
पिछले कुछ दिनों से रीमा उनके घर नहीं आ रही थी। उसका मन करता कि वह अपनी बहन से रीमा की गैरहाज़री का कारण पूछे। पर बड़ी बहन से ऐसा पूछने का साहस वह नहीं कर सका। वह यह सोच कर बेचैन था कि कहीं रीमा उसकी चाहत की बात उसकी बहन को न बता दे। उसकी बहन रीमा के घर अक्सर जाती रहती थी।
एक दिन वह अपनी बहन के साथ कैरम खेल रहा था। कमरे में एक सुंदर नौजवान आया। उसने आते ही उसकी बहन की ओर देखते हुए कहा, इधर रीमा तो नहीं आई?
नहीं, इधर तो नहीं आई…आप बैठो, मैं चाय बनाकर लाती हूँ।उसकी बहन ने विशेष ज़ोर देकर उस नौजवान को बैठने के लिए कहा। बहन ने उस नौजवान का उससे परिचय भी करवाया, भैया, ये रीमा के भाई हैं, पवन जी।
उसे लगा जैसे रीमा के भाई को देखकर उसकी बहन की आँखों में विशेष चमक आ गई है। उस दिन के बाद रीमा का उनके घर आना-जाना जारी रहा। पर अब वह जहाँ तक सँभव होता उधर जाने से बचता, जिधर उसकी बहन साथ बैठी होती। अपने घर में रीमा की उपस्थिति उसे बुरी लगती। वह दिन-रात सोचता रहता कि दोनों सहेलियों के संबंधों को कैसे ख़त्म करवाए।
                         -0-

Thursday, 15 May 2014

मुहर



निरंजन बोहा

बुढ़ापा-पेंशन के फार्म तसदीक करवाने के लिए वह अपने गाँव की महिला सरपंच के घर गया। वह भैंस की धार निकाल रही थी।
जी, इन फार्मों पर आपके हस्ताक्षर करवाने हैं।मैंने विनती की।
सरदार जी मंडी गए हैं, शाम तक आएँगे…फार्म-फूर्म का काम वे ही करते हैं। शाम को आ जाना।महिला सरपंच ने बिना फार्म देखे कह दिया।
औरत को सत्ता में भागीदार बनाने के लिए बने कानून की सार्थकता संबंधी विचार करता, मैं निराश हो घर लौट आया।
शाम को सरपंच का पति करतार सिंह घर ही मिल गया। उसने मेरे फार्मों पर झट से मुहर लगा दी। फिर जूठे बर्तन माँज रही अपनी पत्नी को आदेशात्मक स्वर में कहा, अरी, यहाँ हस्ताक्षर कर दे, अपने ही आदमी हैं।
मुझे लगा जैसे करतार सिंह ने मेरे फार्म पर एक की जगह दो मुहरें लगा दी हों।
                          -0-

Tuesday, 27 August 2013

बौने



निरंजन बोहा

अपने पति के व्यवहार में आई तबदीली को महसूस कर, वह खुश भी थी और हैरान भी। एक मुद्दत के बाद राजीव ने उस पर दिल खोल कर प्यार लुटाया था। थकावट व अनिद्रा की वजह से उसका बिस्तर से उठने को मन नहीं कर रहा था। बहुत समय बाद पति संग व्यतीत की हसीन रात की याद को दिल की गहराई में सुरक्षित रखने के लिए उसने अपना सारा ध्यान उस ओर ही केंद्रित किया हुआ था। मीठे-मीठे सरूर में उसकी पलकें बंद हो रही थीं।
अपने पति की नज़रों में वह न तो सुंदर थी और न ही अक्ल की मालिक। पति के खानदान को वह जायदाद का वारिस भी नहीं दे सकी थी। अपने पति व सास-ससुर की हर ज्यादती को सहने के काबिल तो वह हो चुकी थी, पर जब कभी राजीव उसे तलाक देने की धमकी देता तो उसकी सहनशक्ति जवाब दे जाती। वह घंटों तक रोने के लिए मजबूर हो जाती। अब तो दो रातों के मधुर-मिलन ने उसके सारे शिकवे दूर कर दिए थे।
उठ हरामजादी, सात बज गए। अभी तक बिस्तर पर पड़ी है। झँझोड़कर उठाते हुए राजीव ने उसके हसीन सपनों को भंग कर दिया। पति को अपने पहले रूप में आया देख वह काँप उठी।
उठ, रोज करती थी न मायका, मायका, आज तुझे सदा के लिए मायके भेज देना है।राजीव गरजा।
ये सुबह ही तुम्हें क्या हो गया?…रात को तो…वह बात पूरी न कर सकी। उसका गला भर आया।
वह तेरी इस घर में आखरी रात थी। मैंने सोचा कि जाती बार का फायदा उठा लूँ।एक कमीनी मुस्कान उसके पति के होठों पर चिपकी हुई थी।
पहली बार गुस्से भरी झनझनाहट उसके सारे शरीर में से गुज़र गई। उसे लगा कि सचमुच उसका पति उसके योग्य नहीं है।
                          -0-