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Tuesday, 18 August 2015

बहू बनाम बहू



हरभजन सिंह खेमकरनी

नया स्कूटर खरीदने संबंधी घर में विचार-विमर्श चल रहा थी। कभी बैंक से कर्जा लेने की बात चली तो कभी किसी रिश्तेदार से पैसे उधार लेने की। पर कोई भी बात सिरे नहीं लग रही थी।
मनजोत की सास इशारे से उसे अपने मायके से पैसे लाने को कह चुकी थी क्योंकि उसके भाई पैसे वाले थे। अगर वे बहन को स्कूटर ले देंगे तो उसे ही आने-जाने की मौज हो जाएगी। लेकिन मनजोत सास की बात सुनी-अनसुनी कर देती। परंतु कुछ दिनों से पति का रूखा व्यवहार भी उसे सास की बात ही दोहराता लगता। उसे लगा कि दहेज रहित करवाए गए आदर्श विवाह के समय तय किए गे उसूलों में दरारें पडने लगी हैं। पिछले कुछ समय से घर के कुछ सदस्यों के व्यवहार में आई तबदीली से भी वह परेशान थी। उसकी सोच इस बात पर आ कर अटक जाती कि एक माँग पूरी होने पर दूसरी माँग उठ खड़ी होगी। इसलिए उसने खामोशी का दामन पकड़े रखा।
घर में होती खुसुर-फुसुर को महसूस कर मनजोत के ससुर ने अपनी पत्नी को पास बैठा कर समझाते हुए कहा कि वह बहू को मायके से पैसे लाने के लिए परेशान न करे। आगे से पत्नी तमक कर बोली, अपना आदर्श अपने पास रखो, शादी के समय तो बाप-बेटे ने दहेज न लेकर बहुत बल्ले-बल्ले करवा ली। अब बहू स्कूटर के लिए पैसे ले आएगी तो उन्हें क्या घाटा पड़ जाएगा, बहुत पैसा है उनके पासआजकल तो लोग कारें दे रहे हैं।
“पैसे वाले तो तेरे भाई भी हैं, उनसे स्कूटर के लिए पैसे माँग ले, तू भी तो इस घर की बहू ही है। मुझे कौन सा उन्होंने शादी के समय स्कूटर दिया था।” पति ने हँसते हुए कहा।
पति की बात सुन पत्नी माथे पर आए पसीने को दुपट्टे से पोंछने लगी।
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Monday, 22 June 2015

एकांतवास



हरभजन सिंह खेमकरनी

शहर में रह रहे बेटे के पास गई मुख्त्यार कौर अकसर आठ-दस दिन बाद वापस गाँव लौट आती। फिर धूल-मिट्टी से भरे घर की सफाई में लग जाती। वृद्ध शरीर जल्दी ही थक जाता। अड़ोस-पड़ोस में रहने वाली उसकी देवरानी-जेठानी ने उसे कई बार कहा कि घर की चाबियाँ उन्हें दे जाया करे, वे घर की सफाई करवा दिया करेंगी। वे कहीं घर पर ही कब्जा न कर लें, इस डर से वह उन्हें चाबियाँ न देती।
इस बार जाते समय वह कह गई थी कि अब वह शहर में ही रहेगी। परंतु कुछ दिनों बाद ही लौट आने के कारण वह चर्चा का विषय बन गई। लोग कह रहे थे पुत्र-वधु से नहीं बनी होगी, खान-पान पर टोका-टाकी के चलते दोनों में खटपट हुई होगी।
रिश्ते में बहू लगती मनिंदर कौर ने चाय का गिलास मुख्त्यार कौर की ओर बढ़ाते हुए कहा, प्रणाम चाची, तुम तो कहती थी कि अब बेटे के पास ही रहना है, क्या बात बहू ने सेवा नहीं की?”
नहीं बेटी, ऐसी बात नहीं। बस दिल ही नहीं लगा वहाँ।
बैठे-बिठाए सब कुछ मिलता होगा। दिल तो घर के लोगों में लग ही जाता है चाची।
ये बात तो तेरी ठीक है। पर क्या बताऊँ, बेटा-बहू सुबह के नौकरी पर गए शाम पाँच-छः बजे घर लौटते। फिर बच्चों के साथ घूमने निकल जाते। बच्चे भी स्कूल से लौट कर ट्यूशन पर चले जाते या फिर टी.वी. देखते रहते। रोटी दोनों वक्त नौकर कमरे में दे जाता। किसी के पास बात करने के लिए समय ही नहीं, बस कभी-कभार कोई कमरे में आकर खड़े-खड़े ही मिल जाता। अड़ोस-पड़ोस में जाने का हुक्म नहीं, दो घड़ी दुःख फरोले तो किसके साथ।
चाची, शहर में आस-पड़ोस में भी किसी के पास समय नहीं होता कि अपनी तरह बैठ कर दुःख-सुख सांझा करे। उन्हें तो पता ही नहीं होता कि उनके पड़ोस में रहता कौन है।
यही सोच कर वापस आ गई हूँ बेटी। यहाँ तो मिलने-जुलने वालों की आवाजाई लगी रहती है। दिन हँसते-खेलते बीत जाता है। दुःख-सुख में तुम्हारा आसरा है। मुख्त्यार कौर के मन की पीड़ा उसके चेहरे से झलक रही थी।
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Monday, 3 November 2014

पहला कदम



हरभजन सिंह खेमकरनी

धूम-धाम से हुई शादी के बाद तीन माह कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। पति जसविंदर को वापस कैनेडा जाने के लिए तैयारी करते देख सिमरनजोत का मन खिल उठा कि बस अब कुछ ही दिनों में कैनेडा की धरती उसके पाँव तले होगी। लेकिन परिवार की ओर से उसे तैयारी करने के लिए कोई संकेत नहीं मिला था। शादी से पहले तय तो यही हुआ था के वे दोनों कैनेडा एक साथ जायेंगे। परंतु कैनेडा जाने के लिए आवश्यक कागज-पत्रों के बारे में उसे तो कुछ नहीं बताया जा रहा। उसे लगा, कहीं जाने का समय नजदीक आने पर उसे कागजों के न आने के बहाने का सामना न करना पड़े। शंका निवृत्ति हेतु उसने पति से बात करना ठीक समझा।
लगता है आप कैनेडा जाने की तैयारी कर रहे हो, और मैं?”
इस बार तो तेरा साथ जाना मुश्किल है, कागज़ पूरे नहीं हो रहे।
कागजों का क्या है, आजकल तो आन-लाइन सारा काम हो जाता है। टिकट के पैसे भी  डैडी ने पहले ही दे दे दिए हैं।
“पैसे देकर उन्होने मुझ पर कोई एहसान नहीं किया। लड़कियों को कैनेडा भेजने के लिए लोग लाखों रुपये देनें को तैयार बैठे हैं। हमने तो सिर्फ किराया ही माँगा।”
“तब यह बात भी तय हुई थी कि आप मुझे कैनेडा साथ लेकर जाओगे।”
“अगर मैं न लेकर जाऊँ तो अब तुम क्या कर लोगी? शब्दों से हँकार झलक रहा था।
सिमरनजोत एक बार तो काँप उठी। उसने समाचार-पत्रों में विदेशी लड़कों द्वारा शादी पश्चात इधर की लड़कियों को विधवा जैसा जीवन व्यतीत करने के लिए छोड़ जाने संबंधी कई घटनाओं के बारे में पढा था। उसे लगा कि उसके साथ भी ऐसा ही कुछ घटने वाला है। उसने मन ही मन फैसला किया और बोली, “करना क्या है, फैसला आप पर छोड़ती हूँ, या तो मुझे साथ ले जाने का प्रबंध कर लो, नहीं तो तलाक…”
सिमरोनजोत के चेहरे पर दृढ़ता के भाव देख जसविंदर को पाँव तले की जमीन खिसकती हुई लगी।
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Sunday, 3 August 2014

साँझ



हरभजन सिंह खेमकरनी

गाँव में मैरिज-पैलेस बन जाने से गाँव के लोगों को सुखद अहसास हुआ सबकुछ एक ही जगह, न चाँदनी-कनात का झँझट, न गुरुदुआरे के बरतनों की जरूरत। और न ही लकडी-बालन की चिंता। चाय-पानी व खाना बनाने और परोसने की जिम्मेदारी भी पैलेस वालों की। लिस्ट के अनुसार सामान दो और बेफ़िक्र हो जाओ।’— यह सोचते हुए कर्मजीत सिंह ने लड़की की शादी के लिए पैलेस बुक करवा दिया। कर्मजीत सिंह का पिता सोचने लगा कि बेटे ने ठीक ही किया। आजकल रिश्तेदार भी कौन-सा काम करवाते हैं। पहले तो सारा गाँव ही बारात की सेवा के लिए उमड़ पड़ता था। अब तो लड़के-लड़कियाँ नाच-कूद तक सिमट कर रह गए हैँ, डैक बंद ही नहीं करने देते।
निश्चित दिन पैलेस में रिश्तेदार व सज्जन-मित्र पहुँचने शुरू हो गए। कुछेक ने हाथ में शगुन वाले लिफाफे पकड़ रखे थे ताकि फोटो में आ सकें। एक तरफ खड़े निहाल सिंह सरीखे एक-दो बुजुर्ग प्रतीक्षा कर रहे थे शादी वाले परिवार का कोई व्यक्ति चाय-पानी के लिए कहे। उन्होंने देखा कि सभी सीधे मिठाई वाले मेजों की और जा रहे थे। निहाल सिंह ने केहर सिंह की ओर सवालिया नज़रों से देखा तो वे दोनों भी उधर को हो लिए।
“निहाल सिंह, अब तो बरतन साफ करने वाली महरी की भी जरूरत नहीं रही। देख प्लेटें भी कागज की और गिलास भी। खाओ-पीओ और टब में फेंको।”
“हाँ भाऊ जी, पहिले समय में शादी वाले घर से नाई साँसी, झीवर, तथा कई और परिवारों की रोजी-रोटी चलती थी। उनका हक तो मारा गया।”
“बात तो तुम्हारी ठीक है, पर वक्त के साथ बदलना ही पड़ता है। आजकल तो दहेज के सामान की लिस्ट के साथ लड़के वाले पैलेस का नाम भी लिख कर भेजते हैं। नया-गाँव वालो को इसीलिए लड़की की शादी शहर में करनी पड़ी थी। वैसे देख ले छोटे-बड़े सब एक हुए पड़े हैं। पहले अपने को कौन चाय-पानी व मिठाई के पास फटकने देता था। बड़े घरों की शादियों में, बस जूठन इकट्ठी कर के दे देते थे।
चेहरे पर कड़वाहट-सी लाते हुए केहर सिंह ने चाय का आखरी घूँट भरा और गिलासी टब में फेंक दी।
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