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Monday, 23 September 2013

बूढ़ी भिखारिन



गुरदीप सिंह पुरी

“बेटा, सुबह का कुछ नहीं खाया। भगवान के नाम पर रोटी दे-दे। भगवान तुझे लंबी उम्र दे। तेरी कुल ऊँची हो। तेरा आँगन खुशियों से भरा रहे।” बूढ़ी भिखारिन ने दफ्तर के लॉन में बैठे बाबू को रोटी वाला डिब्बा खोलते देख मिन्नत की।
बाबू ने डिब्बा खोला तो उसमें सदा की तरह तीन रोटियाँ ही थीं। उनसे बाबू का पेट ही मुश्किल से भरता था।
बाबू ने थोड़ी सी सब्जी रखकर दो रोटियाँ बूढ़ी भिखारिन की ओर बढ़ा दीं।
बूढ़ी के थिरकते होठों से बस यही निकला, “बेटा, रोटियां तो तीन ही हैं। तुम खा लो, मेरा क्या है…मैं तो कहीं और से माँग लूँगी। तुम भूखे रह गए तो…।”
बूढ़िया लाठी टेकते आगे बढ़ गई। बाबू बहुत देर तक अपने आँसू रोकने का प्रयास करता रहा।
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Saturday, 26 February 2011

श्रद्धांजलि


 इंग्लैंड में रह रहे पंजाबी लघुकथा लेखक श्री गुरदीप दीप पुरी पिछले दिनों इस दुनियाँ को सदा के लिए अलविदा कह गए। उनका पंजाबी लघुकथा संग्रह ‘खाहिश’ पंजाबी में चर्चित रहा है। ‘पंजाबी लघुकथा’ अपनी ओर से इस दिवंगत लेखक को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। प्रस्तुत है दिवंगत लेखक की दो लघुकथाएँ।  
                                       
                             बोझ
“यार, जबसे यह नई कमेटी आई है न, ससुरों ने गुरु-घर में सुधार लहर ही चला दी है।” गुरुद्वारे के ग्रंथी-सिंह ने बड़े दुखी स्वर में कहा।
“वह कैसे?” दूसरे गुरुद्वारे के ग्रंथी ने हैरान होते हुए गुरुभाई से पूछा।
“देखो न, नई गोलक रख दी है। इसमें न चिमटी पड़ती है और न ही गोंद लगी तीली। अब ये छोटी-छोटी हरकतों पे उतर आए हैं। रात को अखंडपाठ की माया भी गोलक में डाल जाते हैं।”
“हूवर चला लिया कर। ऐसे दुखी मत हो।”
यह सुनते ही पहले ग्रंथी के मन से बड़ा बोझ उतर गया।
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                         फंड
“प्रिंसीपल साहिब! यह मेरी कहानियों की नई पुस्तक छपी है। इसकी दो प्रतियाँ स्कूल की लायब्रेरी में रख लें। कुछ खर्चा-वर्चा ही निकल जायेगा।”
“रख तो लेते यार, पर फंड ही नहीं हैं।”
“हमने कौन सी बैंक की किश्त उतारनी है जी। हमने तो आपके साथ शाम को शुगल ही करना है, लद्धे मछली वाले के बैठ के। साथ में घूँट-घूँट दारू…।” उसने हंसते हुए कहा।
“दे जा फिर पाँच प्रतियाँ। हिसाब लद्धे के यहाँ बैठ कर कर लेंगे।”  प्रिंसीपल ने रुमाल से मुँह पोंछते हुए कहा।
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Monday, 12 July 2010

सेवक


गुरदीप सिंह पुरी

मैं फिरोज़पुर शहर के एक चौराहे के कोने में बनी मुसलमान फ़कीर की मज़ार पर माथा टेकने गया। सुना था कि यहाँ सच्चे मन से जो कोई भी आता है, उसकी सब मुरादें पूरी हो जाती हैं। मैंने पाँच रुपये का प्रसाद लिया और माथा टेककर सेवा कर रहे मिजावर को पकड़ा दिया। मैं प्रसाद लेकर अभी मुश्किल से पाँच-छः कदम ही बाहरी दरवाजे की ओर बढ़ा था कि मज़ार की सफाई कर रहे एक सेवक ने मुझे रोक लिया।
“सरदार जी मेरी विनती सुनकर जाना।”
“बता भाई?”
“मैं यहाँ पिछले आठ साल से सेवा कर रहा हूँ। मेरी घरवाली की दाईं छाती में कैंसर है। बहुत इलाज करवाया सरदार जी, पर आराम नहीं आया। अब डॉक्टर कहते हैं कि चंडीगढ ले जाओ। ले तो जाएँ सरदार जी, पर मेरे पास तो इस मज़ार पर माथा टेकने को पाँच पैसे भी नहीं हैं। आप ही कोई हीला-वसीला करो सरदार जी…आपके बच्चे जीएं…।”
वह बोलता गया। मैं मज़ार पर श्रद्धा से आने व पूरी होने वाली मुरादों तथा आठ साल से सेवा कर रहे सेवक की भावनाओं व उसके माँगने के ढंग के बीच के अंतर को टटोलता पता नहीं कब मज़ार का बाहर वाला दरवाजा पार कर गया था।
मुझे बाहर जाता देख वह मज़ार के फर्श पर फिर से झाड़ू लगाने लग गया।
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Tuesday, 4 August 2009

मां


गुरदीप सिंह पुरी

उस दिन मां के साथ जब मामूली–सी बात पर उसका झगड़ा हो गया तो वह बिना नाश्ता किए ही ड्यूटी पर जाने के लिए बस–अड्डे की ओर चल पड़ा । घर से निकलते वक़्त मां के यह बोल उसे ख़ंजर की तरह चुभे, “ तेरी आस में तो मैने तेरे अड़ियल और नशेबाज बाप के साथ अपनी सारी उम्र गाल दी, कि चलो बेटा बना रहे, और दुष्ट तू भी…।” मां के शेष बोल आंसूओं में भीग कर रह गए । वह जा़र–ज़ार रोने लगी।
घर से बस–अड्डे तक का सफर तय करते हुए उसे बार–बार यही ख्याल आता रहा कि वह मां के कहे बोल नहीं बल्कि मां द्वारा सृजित एक–एक अरमान को पांवों तले रौंदता चला जा रहा है । पर वह चुपचाप चलता रहा, चलता रहा।
बस–अड्डे पर पहुंचकर जब वह अपनी बस की ओर बढ़ा तो देखा, मां हाथ में रोटी वाला डिब्बा लिए उसकी बस के आगे खड़ी थी। बेटे को देखते ही मां ने रोटी वाला डिब्बा उसकी ओर बढ़ा दिया। मां के खामोश होंठ जैसे आंखों पर लग गए हों । एकाएक अनेक आंसू मां की पलकों का साथ छोड़ गए । मां को ऐसे रोते देख कर उससे एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया गया और अगले ही पल वह मां के चरणों में था ।
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