Monday, 8 October 2012

भीतरी ज़ख़्म



नायब सिंह मँडेर

बस-अड्डे पर बैठी तारो का अंदर आँखों के रास्ते फूट पड़ा। वह इतना रोई कि सुबकियाँ लेते उसका गला सूख गया। वह बेहोश हो गई। अपनी बेटी को तीज के त्यौहार का सामान देकर वापस आई मेलो ने देखा कि तारो चबूतरे पर औंधे-मुँह बेहोश पड़ी थी। उसने तारो को हिलाया और भागकर नलके से पानी लाकर तारो के मुंह को लगाया। तारो को कुछ होश आया।
“क्या बात री, तेरा ये हाल?” मेलो ने कहा।
तारो बिना कुछ बोले मेलो के सीने से लग कर फिर से सुबकने लगी।
“अरी, सुख से तुझे किस बात की कमी है? अच्छी ज़मीन-जायदाद है, बहू-बेटे तेरी सेवा करने को। बेटी तेरे नहीं कोई, बी उसका दुःख है।” मेलो ने रो रही तारो से कहा।
तारो ने दुपट्टे के पल्लू से मुँह पोंछते हुए कहा, “मेलो, तुम तो मुझसे सौ गुना अच्छी है, जिसकी इकलौती बेटी, काँटा चुभे पर भी भागी आती है। मेरी जून कितनी खराब है, यह मैं ही जानती हूँ। दस दिन हो गए बुरी बीमारी लगी को, किसी ने पूछा तक नहीं। बेटी होती तो हाथों पर उठा लेती।” अपना दर्द बता तारो फिर रो पड़ी।
“ना  री, दुखी न हो, रब भली करेगा। चल घर चलें।”
“अरी मेलो, किस घर की बात करती है, घर तो उसी दिन पराया हो गया था, जब से तेरा जेठ गुजरा है। कोई जात नहीं पूछता।” तारो ने दुखी मन का दर्द बयान किया।
“अरी, बहू नहीं बुलाएगी, बेटे को तो तरस आएगा। चल मेरे साथ घर चल।” मेलो ने ज़ोर देकर कहा।
“मेलो, कौनसे बेटे की बात करती है, उससे तो ससुरालिए ही नहीं सँभलते। उसने आज मुझे धक्के देकर बाहर निकाल दिया।” तारो फिर बेहोश हो गई। गाँव की पंचायत उसे उठा कर घर ले गई। बेटे का मुँह देखने को तरसती रही मेलो के मुख से स्वयं ही निकल गया, “बेटे की माँ होने से तो बेटी की माँ होना ही अच्छा।”
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Monday, 24 September 2012

साझा दुःख


हरभजन खेमकरनी

परवीन को मायके आए सात-आठ दिन हो गए थे। चलते वक्त उसकी सास ने कहा था कि दो-तीन दिन में लोट आना। ब्याही बेटियाँ मायके में अधिक दिन रहें तो लोग कई तरह की बातें बनाने लग जाते हैं। लेकिन उसे अपनी जेठानी गीता के पड़ोसन को कहे बोल बेचैन कर रहे थेः
‘बहन, इस बार जब मायके गई तो दो हज़ार वाल सूट लाउँगी। आती बार मम्मी को कह आई थी कि सूट ला कर रखना और इनके लिए जीन्स भी।’
‘हाँ बहन, तुम हुई अकेली, तुम भी तीन-चार बहनें होतीं तो…’
‘मम्मी कहती थी कि बेटियों को मायके से हर बार कुछ न कुछ मिल ही जाता है, पर दामाद की बारी तो कभी ही आती है।’ पड़ोसन की बात अनसुनी कर गीता ने कहा था।
‘तेरी बात तो ठीक है, मायके से मिलता रहे तो ससुराल में इज्जत बनी रहती है। जब भी मायके से आएँ तो सारे परिवार की नज़र बैग पर ही लगी होती है। माँ-बाप जैसे-तैसे भेजते वक्त बेटी को कुछ न कुछ ज़रूर देते हैं।’ पड़ोसन ने आह भरते हुए अपना दुःख व्यक्त करने का प्रयास किया तो गीता ने नाक-भौं सिकोड़ लिए।
परवीन खुश भी हुई और उदास भी क्योंकि वह अपने मायके की स्थिति से अनजान नहीं थी। कई बार मुश्किल से बस का किराया देते हुए उसकी माँ ने कहा था– ‘देख बेटी, तुझ से कुछ भी छिपा नहीं है, अभी तेरी दो बहनें और सिर पर चढ़ी खड़ी हैं। अगली बार जरूर कुछ न कुछ…’ आगे माँ की जुबान साथ न देती।
तभी उसे अपनी सास की कही बात याद आई। उसने कहा था– ‘देख बेटा, बेटियाँ मायके और ससुराल की इज्जत की बराबर की भागीदार होती हैं। तेरे सामने तेरी ननद को केवल प्यार देकर ही विदा किया है। तेरी जेठानी थोड़ी घमंडी स्वाभाव की है, माँ-बाप की इकलौती बेटी जो हुई। मैंने उसकी माँ को कई बार हाथ जोड़ कर कहा है कि देन-लेन न किया करे। पर वह तो कहती है कि सबकुछ लड़की का ही है, हाथ से देंगे तो जग में शोभा बढ़ेगी। पर बेटी, उसकी रीस कर तू अपने माँ-बाप को तंग न करना।’
दुविधा में पड़ी परवीन ने जब यह बात माँ को बतायी तो उसके चेहरे पर चमक आ गई। वह बोली, “सवेरे तेरा भाई तुझे बस में बिठा देगा।”
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Monday, 10 September 2012

माँ


जोगिंदर भाटिया

वह नया-नया स्कूल में अध्यापक लगा था। बहुत ही साधारण व्यक्ति था और बच्चों को मन लगाकर पढ़ाता था। उसके साथी अध्यापक उसे कहते, “तेरा नशा जल्दी ही उतर जाएगा। तू हमारी ओर देख, मर्जी से आते–जाते हैं, मजे से छुट्टियाँ मनाते है। पढ़ाएँ या न, कोई नहीं पूछता। बस प्रिंसीपल मैडम की जी-हुज़ूरी कर लेते हैं।”
“भाइयो, यही तो मुझ से नहीं होता। मुझे तो मेहनत व उसूल विरासत में मिले हैं। मैं इन्हें कैसे त्याग दूँ। एक ऊपर वाले के सिवा मैं किसी से नहीं डरता।”
अध्यापकों के एक ग्रुप ने उसकी शिकायत प्रिंसीपल से कर दी–‘नया अध्यापक कहता है कि वह मैडम से नहीं डरता’
बस फिर क्या था, मैडम एकदम भड़क गई। उसने अध्यापक को अपने पास बुला लिया।
“सुना है तुम पीठ के पीछे मेरी बदनामी करते हो। अगर यह बात साबित हो गई तो मैं तुम्हारी गुप्त रिपोर्ट कराब कर दूँगी। तुम तो अभी पक्के भी नहीं हुए।”
“मैडम, आप मेरी गुप्त रिपोर्ट खराब कर ही नहीं सकतीं।” उसने साहस-भरा जवाब दिया।
“वह कैसे?”
“स्कूल के मुखी माँ-बाप की तरह होते हैं। इस तरह आप मेरे लिए माँ के समान हैं। माँ कभी भी अपने बेटे का बुरा नहीं सोच सकती।”
उसकी बात सुन प्रिंसीपल अवाक् रह गई।
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Sunday, 2 September 2012

घर का मालिक


विनोद मित्तल समाना

“तू मुझे रोकेगी? मुझे? मैं तेरा घरवाला हूँ, घरवाला; इस घर का मालिक। मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ। तू चुप करके छिपा कर रखे गहने दे दे।” धर्मे ने अपनी घरवाली को बालों से पकड़ते हुए कहा।
“रब्ब की सौगंध! मेरे पास कुछ नहीं है, तुम्हें देने के लिए। जो था, वह तुम पहले ही लेजा चुके हो।” उसकी पत्नी ने विनती-सी करते हुए कहा।
‘तड़ाक’ से उसने अपनी पत्नी के थप्पड़ जड़ दिया। तभी उनका बेटा जीता भी आ गया।
“किधर गया था रे, बड़े पढ़ाकू? कहाँ से लाया है तू यह किताब?” धर्मे ने जीते के हाथ में किताब देख कर पूछा। फिर वह उसकी जेबें टटोलने लगा। जेब में से कुछ रेजगारी निकल आई। तब वह गरजता हुआ बोला, “देख, साला यह भी अपनी माँ जैसा हो गया। मुझ से छिपा कर पैसों की किताबें खरीदता फिरता है। बात सुन ले रे, तूने कल से स्कूल नहीं जाना। यूँ ही खर्च करी जाता है। मैं कल तुझे रामू के ढ़ाबे पर लगवा कर आऊँगा।”
निठल्ले शराबी बाप ने उस से रेजगारी छीन ली और धक्का देकर बाहर चला गया।
“बेटे, तुझे ये पैसे कहाँ से मिले? और तू सवेर का कहाँ था?” जीते की माँ ने आँखें पोंछते हुए कहा।
“माँ, आज रविवार था। मेरे पास किताब नहीं थी। स्कूल की फीस भरने की भी कल आखरी तारीख है। मुझे पता था कि तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं, इसलिए आज भट्ठे पर काम करके कुछ पैसे कमा कर लाया था, वे बापू ने ले लिए।” जीते ने बताया तो माँ ने बेटे को अपने सीने से चिपका लिया।
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Sunday, 26 August 2012

कृतघ्न


दर्शन सिंह बरेटा

वृद्धाश्रम में सुबह अखबार के पन्ने पलटते हुए उसका ध्यान बीते जीवन की ओर चला गया। कुछ दिनों से वह बेचैनी में जी रहा था। दो बेटे जन्मे, पाले-पोसे, पैरों पर खड़े किए। बड़े को विदेश में सैट करने के लिए मकान समेत कई-कुछ बेचना पड़ा। वह तो बस वहीं का ही होकर रह गया।
‘चलो. उसके तो कोई बस नहीं। पर यहाँ वाला तो सबकुछ कर सकता है। अच्छे-भले दोनों जने नौकरी लगे हैं, कोई कमी नहीं।’ पता नहीं क्या-कुछ वह बुड़बुड़ा गया।
‘बहू का हाल देख लो, जब जरूरत थी तो ‘बापू जी, यह कर दो, वह कर दो। अब मुन्ने को घुमा लाओ। अब मैं दफ्तर चली हूँ, जरा ध्यान रखना।’ आप परेशानियाँ उठा चाव से पोते को पाला। मैं भी परिवार में रहता, खुद को किस्मत वाला समझता।
बच्चे के स्कूल जाने में अभी कई महीने बाकी थे। पहिले ही दोनों ने बडे शहर में अपनी बदली करवाने के लिए उपाय करने शुरू कर दिए। कहते, बड़े शहर के अच्छे स्कूल में बच्चे का भविष्य उज्जवल रहेगा।
मैंने कितना कहा, ‘तू भी तो यहीं पढ़ कर नौकरी लगा है। सब कुछ तो है यहाँ।’
बोला, ‘नहीं बापू जी, हमारे वक्त बात और थी। अब ज़माना बदल गया ।’
दोनों की बदली हो गई, मुझपर बिपता आ गई। दफ्तर से आते ही बहू ने फरमान सुनाया, ‘बापू जी, हमने दो-चार दिन में शहर चले जाना है। वहाँ बड़े मकान का किराया बहुत ज्यादा है। अकेले आपके लिए इस मकान का किराया देना कोई समझदारी नहीं। अगर आप अब वृद्धाश्रम में…।’
“बस-बस, मैं समझ गया। ठीक है, मैं कल ही चला जाऊँगा। तुम खुश रहो, मेरा क्या है।”
“बाबा जी, किसे खुश रख रहे हो? चाय पी लो।” आश्रम के रसोइये ने कहा तो उसकी तंद्रा भंग हुई।
“नहीं-नहीं, कुछ नहीं।” कहते हुए उसने चाय का कप उठा लिया।
नई पीढ़ी की आधुनिक सोच का सताया वृद्ध अपने आँसू बहने से रोक नहीं सका।
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Sunday, 19 August 2012

शरीफ आदमी


अमृत लाल मन्नन

मनु दौड़ती हुई घर में दाखिल हुई और आवाज़ दी, “चाची जी, बाहर डाकिया खड़ा है। आपका एक और पासपोर्ट आया है।”
हरीश की पत्नी पति से पूछने लगी, “बतओ जी, डाकिए को कितने पैसे दूँ, छोटू का पासपोर्ट आया होगा।”
हरीश बोला, “पचास रुपये दे दो, अभी परसों ही तो पासपोर्ट के पचास दिए हैं।”
दो मिनट बाद ही पत्नी वापस आ गई। अपने दिल्ली वाले पोते का पासपोर्ट उसे पकड़ाते हुए बोली, “यह लो जी आपके पचास रुपये, नहीं लिए उसने।”
सतीश एकदम भड़क उठा, “नहीं लिए साले ने! और क्या भैंस खोल कर दे दें। ड्यूटी करते हैं साले, हमारे सिर पर एहसान नहीं करते।”
उसकी पत्नी बोली, “पहले पूरी बात तो सुन लो जी, बस हर वक्त लड़ने को तैयार रहते हो। डाकिया कहता–उसे हमारे बेटे और पोते के नामों का पता नहीं था। एड्रेस अधूरा होने के कारण वह दो दिन इधर-उधर पूछता रहा। आज पता चला कि यह पासपोर्ट हमारे पोते का है।”
“अच्छा तो फिर सौ रुपये दे-दे उसकी खज्जल-खुआरी के।” सतीश बोला।
“शरीफ आदमी है जी, बधाई नहीं ली उसने। कहता, ‘परसों भी आपने जबर्दस्ती दे दिए थे पचास रुपये। डाक बाँटना तो हमारा काम है, किसी पर एहसान नहीं।”
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Tuesday, 7 August 2012

किराए का मकान


सुरिंदर कैले

शरनजीत का बचपन से ही एक सपना था–अपना मनपसंद घर।
बचपन से जवानी और जवानी में शादी हो जाने पर उसका सपना बार-बार उसके मस्तिष्क में दस्तक देता रहा। वह और उसका पति अपना घर बनाने के लिए एक-एक पैसा जोड़ने की कोशिश करते, पर बैंक-बैलैंस वहीं का वहीं रहता। बच्चों का पालन-पोषण, पढ़ाई, शादी आदि के खर्चों ने उन के हाथ बाँध कर रखे। वे मकान तो बदलते रहे, पर घर नसीब न हुआ। किराए के मकानों में उन्हें तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता। इसलिए किराए के मकान उन्हें कभी भी घर न लगते।
वह सोचती– अपने घर में मैं मनपसंद रंग करवा सकूँगी। जिस दीवार पर चाहूँ कील गाड़ कर तस्वीर टाँग सकूँगी। आवश्यकता अनुसार अलमारियाँ, खुली रसोई व बाथरूम बनवा सकूँगी। और तो और अपने घर में अपनी मर्जी के अनुसार रह सकूँगी, जो चाहे करूँगी। ऊँचा बोलूँगी, शोर और धमाचौकड़ी मचाऊँगी। कोई मुझे रोकने-टोकने वाला नहीं होगा। मकान मालिक की बंदिशों से मुक्त मैं अपनी मर्जी की मालिक होऊँगी।
शरनजीत अपने बनाए नए और सुंदर घर के लॉन में चहल कदमी करती बचपन के सपने को याद कर रही थी। यह घर रिटायरमेंट पर मिले पैसों से ही संभव हो सका था। पर वह संतुष्ट नहीं थी। बच्चों की जिद्द के आगे उसे कई जगह समझौता करना पड़ा था। फिर भी वह खुश है कि नया मकान उसके अपने घर जैसा लगता है। नरम-नरम घास पर चहल कदमी करना उसे अच्छा लगता है। वह मानसिक खुशी में मस्त थी। इसी मस्ती के आलम में उसने एक गीत का मुखड़ा ऊँची सुर में गाना शुरु कर लिया।
“मम्मी, प्लीज चुप करो!” भीतर से उसके बेटे ने चीखते हे कहा, “शोर सुनकर मुन्नी जाग जाएगी।”
वह चुप कर गई। उसके भीतर एक टीस-सी उठी, मेरा गाना भी बच्चों को शोर लगता है।
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Saturday, 28 July 2012

ओवर-एज


हरजिंदर कौर कंग

“कौन आया है तुम्हारे साथ? बुलाओ उसे अंदर।” दो सौ से ऊपर ब्लड-प्रैशर देखते ही डॉक्टर राम प्रसाद ने किरनदीप को कहा।
“मेरे साथ कोई नहीं आया डॉक्टर सा'ब, अकेली आई हूँ।”
“कमाल है! इस कंडीशन में किसी न किसी को साथ लेकर आते हैं।”
“डॉक्टर सा'ब! कोई एक दिन आएगा, दो दिन आएगा, रोज़-रोज़ मेरे साथ आने को घर में कौन फ्री है? मुझे तो बीस साल हो गए धक्के खाती को।”
“धक्के खाती को! देखो मैडम, मैं तुम्हारे ब्लड-प्रैशर की बात कर रहा हूँ। तुम्हें बीस साल…।”
“बीस साल से तो डॉक्टर सा'ब मैं इंटरव्यू देती आ रही हूँ।”
“देखो, तुम्हारा ब्लड-प्रैशर बहुत हाई है। इतना ब्लड-प्रैशर ठीक नहीं होता। इस से अटैक होने और लकवा मार जाने का खतरा रहता है। तुम अपना इलाज करवाओ पहले।”
“डाक्टर सा'ब! मुझे जल्दी से दवाई दो। सिर बहुत चकरा रहा है। मैंने बी.ऐड-टीचर की इंटरव्यू के लिए जाना है। मेरी बारी आने वाली होगी। चक्कर आने के कारण आ गई मैं तो।”
“मैडम! पहले सेहत, फिर नौकरी। यह लो एक कैप्सूल। जीभ के नीचे रखकर बाहर बेंच पर आराम करो।” कहते हुए डॉक्टर ने अगले मरीज को बुलाया।
“क्या काम करती हो?”
“जी, बेकार हूँ। घर का काम ही करती हूँ। बी.एस.सी., बी.एड की है। ओवरएज हो गई, नौकरी नहीं मिली।”
डॉ. राम प्रसाद ने उसकी पुरानी पर्ची देखते हुए सोचा– ब्लड-प्रैशर, शूगर…।
तभी उसे किरनदीप की आवाज़ ने चौंकाया, “डॉक्टर सा'ब! मुझे कुछ फर्क है, प्लीज, मैं जा सकती हूँ। यह मेरा आखरी चांस है, इंटरव्यू का…।”
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