आज उन्होंने फिर मिलने का इकरार किया था। शायद यह उनका आखिरी इकरार था।
इस इकरार से पहले, दो बार वायदा करके वे मिल नहीं सके थे। दो बार प्रेमिका बेवफा साबित हो चुकी थी। शायद उसे घर से निकलने का कोई बहाना न मिला हो। शायद घर वालों ने उसकी नज़रों में दीवानगी छलकती देख ली हो। पर इस बार प्रेमी की शर्त बड़ी सख्त थी। उसने पत्र में लिखा था–‘मेरी जान…तुम दो बार वायदा तोड़ चुकी हो। इस बार मुआफ नहीं किया जायेगा। अगर तुम शाम के ठीक चार बजे रेलवे लाइन के नज़दीक हनुमान मंदिर में नहीं पहुँची तो मैं साढ़े चार बजे यहाँ से गुज़रने वाली गाड़ी के नीचे सिर दे दूँगा।’
पर बड़ी बदनसीबी। काश! वह समय पर वहाँ पहुँच सकती। एक दिन पहले ही उसने बहाने ढूँढ़ना शुरु कर दिया।‘सहेली से मिलने जाना है’, ‘मंदिर जाना है’, ‘डॉक्टर से दवा लेने जाना है’, पर उसकी जालिम माँ ने एक न सुनी।
ठीक साढ़े चार बजे गाड़ी चीखती हुई गुजर गई। पर हनुमान मंदिर के पास कोई दुर्घटना न हुई। प्रेमी का मन नफरत से भर गया। उसने सोचा–‘मैं एक बेवफा लड़की के लिए जान क्यों दूँ? अगर वह मुझे प्यार करती होती तो अवश्य आती। मैं नहीं मरूँगा। मैं किसी और वफादार…।’
नफरत से भरा मन लेकर, वह मंदिर से बाहर आ गया। अपने घर लौटते उसके मन में आया, ‘क्यों न उस बेवफा के घर के आगे से गुजरा जाए। अगर वह फिरती हुई दिखे तो उसे गाली देकर ही जाए।’
जब वह उसके घर के आगे से गुजरा तो भीतर से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। घर के भीतर जा रही एक पड़ोसन ने पूछने पर बताया, “इनकी नौजवान लड़की ने खुदकुशी कर ली है।”
“माँ, मैं जाटों के घर लस्सी लेने गई थी। उनका बीरू कह रहा था कि हमारे देश ने बहुत तरक्की कर ली है। जो रेलगाड़ी हमारे गाँव से गुजरती है, वह अब कोयले से नहीं तेल से चलेगी। और यह भी कह रहा था कि बिजली से भी गाड़ियाँ चल पड़ीं।” लड़की बिंदू ने यह खबर बड़ी खुश होकर अपनी माँ को सुनाई।
“खाक तरक्की की है देश ने! जट्ट तो पहले ही खेत में घुसने नहीं देते, चार कोयले उठा कर चूल्हा गर्म कर लेते थे। अब पता नहीं कहाँ-कहाँ हाथ छिलवाने पड़ेंगे काँटों से।” चूल्हे को गर्म रखने की फिक्र में ये बोल चिन्ती के मुँह से खुद-ब-खुद निकल गए।
सवारियों से भरा ताँगा चढ़ाई चढ़ रहा था। घोड़ा पूरा जोर लगाकर ताँगा खींच रहा था। ताँगे की बम्बी से ताँगेवाला नीचे उतरा । उसने सवारियों को भार आगे करके बैठने का इशारा किया। चाबुक की मार और मालिक की हल्लाशेरी से घोड़े ने अपना बाकी का जोर भी ताँगा खींचने में लगा दिया। ताँगेवाला ताँगे के साथ-साथ चलने लगा।
“घोड़े की टाँग खराब है?” घोड़े को लंगड़ाते देख एक सवारी ने आगे झुकते हुए पूछा।
“हाँ।”
“फिर आराम करवाना था इसे।”
“डेढ़ माह के बाद आज ही जोता है।”
“सवारियाँ कम बैठा लिया कर।”
“कम कैसे बैठा लिया करूँ? आठ रुपए किलो के हिसाब से दो किलो चने। चार रुपए का दस किलो चारा। चार रुपए का दस किलो भूसा और पाँच रुपए का मसाला। उनतीस-तीस रुपए घोड़े को चराकर, दस रुपए मुझे भी घर का खर्च चलाने को चाहिएँ।”
“वह तो ठीक है, पर शास्त्रों में लिखा है कि जो व्यक्ति किसी को इस जन्म में तंग करता है, उसका बदला उसे अगले जन्म में देना पड़ता है।” सवारी बोली।
“पहले इस जन्म के बारे में सोच लें, अगले जन्म की अगले जन्म में देखी जाएगी।” कहकर ताँगेवाले ने घोड़े को चाबुक मार दिया।
महानगर के सरकारी दफतर में एक क्लर्क से दूसरे क्लर्क की सीट तक चक्कर काटता, सरपंच जागीर सिंह सुबह से ही परेशान था। धंसी-सी नाक वाला डीलिंग क्लर्क तो उस पर टूट ही पड़ा था, “बाबा! तुझे कह तो दिया कि दो दिन बाद आना, फिर भी तू पीछा नहीं छोड़ता।”गाँव में सरदार कहलाने वाला सरपंच उसके सामने बेचारा-सा बनकर रह गया था। भीड़भाड़ वाले इस महानगर में अजनबी लोगों के बीच घिरे हुए, उसे महसूस हो रहा था जैसे उसका अपना कोई अस्तित्व ही न हो।
ज्यादातर वह अपनी पंचायत के सचिव या अपने कालेज में पढ़ रहे बेटे को ही सरकारी दफ्तर के काम के लिए भेजता था। पर आज किसी खास काम के लिए उसे आप ही महानगर आना पड़ा था। इस शहर का प्रत्येक व्यक्ति उसे भाग-दौड़ में दिखाई दिया। उससे बात करने के लिए किसी के पास फुर्सत ही न थी। भीड़ में घिरे हुए भी स्वयं को अकेला महसूस करने का इतना तीव्र अहसास उसे पहले कभी नहीं हुआ था। इसलिए वह जल्दी से गाँव लौट कर अपनी खोई पहचान हासिल करना चाहता था।“बस-स्टैंड को किस नंबर की बस जाएगी?” उसने सड़क किनारे खड़े एक बाबू से पूछा।
“आगे से पता करो।” रूखा-सा जवाब पाकर, पहले से ही परेशान सरपंच और बेचैन हो उठा। आगे जाकर पूछने की हिम्मत उसमें न रही। बस की प्रतीक्षा करने की बजाय उसने रिक्शावाले को आवाज दी और बिना पैसे पूछे ही रिक्शा में बैठ गया। उसने सोचा झगड़ा करने की बजाय, रिक्शावाला जितने पैसे माँगेगा, वह दे देगा। अपने आप में खोये को पता ही न चला कि कब बस स्टैंड आ गया।
“हाँ भई! कितने पैसे?” उसने अपना बटुआ खोलते हुए पूछा।
“पैसे रहने दो सरदार जी।” रिक्शावाले ने उसका बैग उतारते हुए कहा। पराए शहर में इतने अपनत्व-भरे शब्दों की तो उसे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। वह आश्चर्यचकित रह गया। उसने हैरानी से रिक्शावाले की तरफ देखा। वह तो उसके गाँव का लड़का प्रीतू था जो पाँच साल पहले घर से भाग गया था।
“अरे प्रीतू तू!” सरपंच ने उसे बांहों में भर लिया। प्रीतू हैरान था कि गाँव में रूखे स्वभाव वाला सरदार यहाँ आकर इतना नर्म कैसे हो गया।
‘लगता है तीन बज चले होंगे! …सूरज भी ढल गया!…पर सरदार अब तक रोटी लेकर नहीं आया…।’ चहबच्चे की मुंडेर पर बैठे नीलू ने सूरज की ओर देखा।
एक क्षण के लिए उसके चेहरे पर अफसोस-सा पसर गया। लेकिन अगले ही पल उसे चारपाई पर पड़े बीमार बाप की बात याद आई–‘नीलू बेटा! आज काम कर आ बस। ’गर न गए तो सरदार दिहाड़ी काट लेगा।…और फिर आज तू आराम की रोटी तो खा लेगा।…घर पर तो तुझे पता ही है, पूड़े पकते हैं रोज…!’
बापू की बात मान कर वह सवेरे ही सरदार के खेत में आ गया था। आते ही उसने बताए अनुसार क्यारों में पानी छोड़ दिया। पानी का रास्ता बदलते-बदलते वह हाल से बेहाल हो गया। भूख से उसके पेट में चूहे दौड़ने लग गए। तीन बजने वाले हो गए, मगर अभी तक न सवेर की, न दोपहर की रोटी आई थी।
“नीलू, ये ले पकड़ रोटी!”
भूख का मरसिया पढ़ रहे नीलू ने सिर घुमा कर पीछे देखा, सरदार रोटी लिए खड़ा था। इससे पहले कि वह कुछ बोलता, सरदार ने फटाफट कपड़े में से दो-तीन रोटियाँ निकाली। रोटियों पर अचार रख, उसके हाथों में पटकते हुए उसने हुक्म जारी किया, “कस्सी उठा और क्यारों के चारों ओर चक्कर लगा। बैठना बिलकुल नहीं।…रोटी मेंड़ पर चलते-चलते ही खा लेना।”