Sunday, 4 July 2010

ताँगेवाला


गुरमेल मडाहड़


सवारियों से भरा ताँगा चढ़ाई चढ़ रहा था। घोड़ा पूरा जोर लगाकर ताँगा खींच रहा था। ताँगे की बम्बी से ताँगेवाला नीचे उतरा । उसने सवारियों को भार आगे करके बैठने का इशारा किया। चाबुक की मार और मालिक की हल्लाशेरी से घोड़े ने अपना बाकी का जोर भी ताँगा खींचने में लगा दिया। ताँगेवाला ताँगे के साथ-साथ चलने लगा।

“घोड़े की टाँग खराब है?” घोड़े को लंगड़ाते देख एक सवारी ने आगे झुकते हुए पूछा।

“हाँ।”

“फिर आराम करवाना था इसे।”

“डेढ़ माह के बाद आज ही जोता है।”

“सवारियाँ कम बैठा लिया कर।”

“कम कैसे बैठा लिया करूँ? आठ रुपए किलो के हिसाब से दो किलो चने। चार रुपए का दस किलो चारा। चार रुपए का दस किलो भूसा और पाँच रुपए का मसाला। उनतीस-तीस रुपए घोड़े को चराकर, दस रुपए मुझे भी घर का खर्च चलाने को चाहिएँ।”

“वह तो ठीक है, पर शास्त्रों में लिखा है कि जो व्यक्ति किसी को इस जन्म में तंग करता है, उसका बदला उसे अगले जन्म में देना पड़ता है।” सवारी बोली।

“पहले इस जन्म के बारे में सोच लें, अगले जन्म की अगले जन्म में देखी जाएगी।” कहकर ताँगेवाले ने घोड़े को चाबुक मार दिया।

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Friday, 25 June 2010

अपनेपन का सरूर


गुरचरण चौहान



लड़की
वालों के यहाँ से सारा काम निपटा कर, मैं और मेरे मामा का बेटा जगदीप, हमारे गाँव की इस गाँव में ब्याही लड़की शरनजीत के घर की तरफ चल पड़े।
शरनजीत के घर-परिवार से हमारी लंबे समय से पटती नहीं थी। हम कई बार थाने-कचहरी जा आए थे। इसलिए मैं सुबह से, जब से बारात आई थी, दुविधा में था कि शरनजीत के घर पत्तल लेकर जाऊँ कि नहीं। बचपन में मैं और शरनजीत इकट्ठे पढ़े थे। भाई-बहनों जैसी सांझ के बारे में सोचते हुए मैंने भावुक होकर बिचोले को कह पत्तल मंगवा ली। वैसे भी आनंद-कारज के बाद हर तरफ पीने-पिलाने का दौर चल रहा था। शराब पीकर व्यक्ति अकसर दिल के पीछे लग भावुक हो जाता है।
हमें पत्तल लेकर आया देख, शरनजीत की खुशी संभाले नहीं संभलती थी। वह मुझसे मेरे घर के एक-एक सदस्य की खैर-सुख पूछती रही।
“अच्छा वीर, आप बैठो, मैं अभी लाई चाय बनाकर।” शरनजीत चौके की तरफ जाती बोली।
“ब्याह में आने वालों को चाय नहीं पिलाते,” बाहर से आए हजूरसिंह ने हमारे साथ हाथ मिला, अंदर से बोतल मेजपर ला रखी। दारू के साथ खाने को पल भर में ही शरनजीत ने कितना-कुछ ला रखा। खाने-पीने का दौर चल पड़ा।शरनजीत हमारे पास आ बैठी और छोटी-छोटी बातें करने लगी। उसने बचपन की बातें छेड़ लीं। छोटी-छोटी यादें।छोटे-छोटे संबंध। अपनत्व भरी भावुक बातें। हजूरसिंह हमें लगातार पैग डाले जा रहा था।
चलते हुए हजूरसिंह ने ‘सड़क वाला पैग’ कह कर एक पैग और डाल दिया।
“अच्छा वीरजी, जब भी इधर आया करो, मिलकर जाया करो। आपका गाँव में लाख गिला-शिकवा हो, गाँव की बेटियाँ तो सांझी होती हैं। मुझे तो चाव चढ़ गया आपको देखकर। यह घर आपके स्वागत के लिए सदा खुला है।” शरनजीत खुशी की लय में मग्न बोले जा रही थी।
“सरूर आ गया!” गली में आकर मेरे मुँह से निकला।
“हाँ! पर यह सरूर दारू से ज्यादा बहन के अपनत्व व प्यार का है।” मेरे दिल की बात जगदीप के मुँह से निकल गई।
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Thursday, 17 June 2010

अपनी मिट्टी


निरंजन बोहा


महानगर के सरकारी दफतर में एक क्लर्क से दूसरे क्लर्क की सीट तक चक्कर काटता, सरपंच जागीर सिंह सुबह से ही परेशान था। धंसी-सी नाक वाला डीलिंग क्लर्क तो उस पर टूट ही पड़ा था, “बाबा! तुझे कह तो दिया कि दो दिन बाद आना, फिर भी तू पीछा नहीं छोड़ता।” गाँव में सरदार कहलाने वाला सरपंच उसके सामने बेचारा-सा बनकर रह गया था। भीड़भाड़ वाले इस महानगर में अजनबी लोगों के बीच घिरे हुए, उसे महसूस हो रहा था जैसे उसका अपना कोई अस्तित्व ही न हो।

ज्यादातर वह अपनी पंचायत के सचिव या अपने कालेज में पढ़ रहे बेटे को ही सरकारी दफ्तर के काम के लिए भेजता था। पर आज किसी खास काम के लिए उसे आप ही महानगर आना पड़ा था। इस शहर का प्रत्येक व्यक्ति उसे भाग-दौड़ में दिखाई दिया। उससे बात करने के लिए किसी के पास फुर्सत ही न थी। भीड़ में घिरे हुए भी स्वयं को अकेला महसूस करने का इतना तीव्र अहसास उसे पहले कभी नहीं हुआ था। इसलिए वह जल्दी से गाँव लौट कर अपनी खोई पहचान हासिल करना चाहता था।“बस-स्टैंड को किस नंबर की बस जाएगी?” उसने सड़क किनारे खड़े एक बाबू से पूछा।

“आगे से पता करो।” रूखा-सा जवाब पाकर, पहले से ही परेशान सरपंच और बेचैन हो उठा। आगे जाकर पूछने की हिम्मत उसमें न रही। बस की प्रतीक्षा करने की बजाय उसने रिक्शावाले को आवाज दी और बिना पैसे पूछे ही रिक्शा में बैठ गया। उसने सोचा झगड़ा करने की बजाय, रिक्शावाला जितने पैसे माँगेगा, वह दे देगा। अपने आप में खोये को पता ही न चला कि कब बस स्टैंड आ गया।

“हाँ भई! कितने पैसे?” उसने अपना बटुआ खोलते हुए पूछा।

“पैसे रहने दो सरदार जी।” रिक्शावाले ने उसका बैग उतारते हुए कहा। पराए शहर में इतने अपनत्व-भरे शब्दों की तो उसे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। वह आश्चर्यचकित रह गया। उसने हैरानी से रिक्शावाले की तरफ देखा। वह तो उसके गाँव का लड़का प्रीतू था जो पाँच साल पहले घर से भाग गया था।

“अरे प्रीतू तू!” सरपंच ने उसे बांहों में भर लिया। प्रीतू हैरान था कि गाँव में रूखे स्वभाव वाला सरदार यहाँ आकर इतना नर्म कैसे हो गया।

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Thursday, 10 June 2010

साक्षरता आंदोलन


टेक ढींगरा ‘चँद’

गाँव में साक्षरता आंदोलन बड़े जोर-शोर से चल रहा था। गाँव की पंचायत ने इस संबंधी व्यापक प्रबंध किए हुए थे। गाँव में से एक जुलूस निकाला जा रहा था। जुलूस में नारे लग रहे थे।
“हाली-पाली करे कमाई, साथ-साथ वह करे पढ़ाई।”
“आप पढ़ो, दूजों को पढ़ाओ, अनपढ़ता को जड़ से मिटाओ।”
नारे लगा रहे सरपंच गुरबख्श सिंह का हाथ अचानक ऊपर उठने से रुक गया। उसने देखा कि उसके सीरी का बेटा तख्ती-बस्ता उठाए जा रहा था। उसने तुरंत आवाज लगाई, “ओ गोलू, किधर मुँह उठाए जा रहा है?”
गोलू सहम गया, “मैं…मैं…।”
“यह क्या बकरी की तरह मैं-मैं लगाई है।” सरपंच की आवाज तेज थी।
“मैं…मैं…पढ़ने जा रहा हूँ…।” गोलू सहमा-सा बोला।
“साला पढ़ने का।” सरपंच ने खींचकर एक थप्पड़ गोलू के गाल पर लगाया।
गोलू के तख्ती-बस्ता गिर गए।
“तुझे पता नहीं, पशु धूप में सड़ रहे हैं। उन्हें छाँव में मैं करूँगा? सरपंच गुस्से में बोला, “चल, घर जा कर पशुओं को छाँव में कर और चारा डाल।”
गोलू रोता हुआ तख्ती-बस्ता उठा, घर की ओर भाग लिया।
सरपंच फिर से काफ़िले में जा जुड़ा। वह पहले से भी अधिक जोर से नारे लगाने लगा, “हाली-पाली करे कमाई, साथ-साथ वह करे पढाई।”
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Thursday, 3 June 2010

आराम की रोटी


जसवीर राणा


‘लगता है तीन बज चले होंगे! …सूरज भी ढल गया!…पर सरदार अब तक रोटी लेकर नहीं आया…।’ चहबच्चे की मुंडेर पर बैठे नीलू ने सूरज की ओर देखा।

एक क्षण के लिए उसके चेहरे पर अफसोस-सा पसर गया। लेकिन अगले ही पल उसे चारपाई पर पड़े बीमार बाप की बात याद आई–‘नीलू बेटा! आज काम कर आ बस। ’गर न गए तो सरदार दिहाड़ी काट लेगा।…और फिर आज तू आराम की रोटी तो खा लेगा।…घर पर तो तुझे पता ही है, पूड़े पकते हैं रोज…!’

बापू की बात मान कर वह सवेरे ही सरदार के खेत में आ गया था। आते ही उसने बताए अनुसार क्यारों में पानी छोड़ दिया। पानी का रास्ता बदलते-बदलते वह हाल से बेहाल हो गया। भूख से उसके पेट में चूहे दौड़ने लग गए। तीन बजने वाले हो गए, मगर अभी तक न सवेर की, न दोपहर की रोटी आई थी।

“नीलू, ये ले पकड़ रोटी!”

भूख का मरसिया पढ़ रहे नीलू ने सिर घुमा कर पीछे देखा, सरदार रोटी लिए खड़ा था। इससे पहले कि वह कुछ बोलता, सरदार ने फटाफट कपड़े में से दो-तीन रोटियाँ निकाली। रोटियों पर अचार रख, उसके हाथों में पटकते हुए उसने हुक्म जारी किया, “कस्सी उठा और क्यारों के चारों ओर चक्कर लगा। बैठना बिलकुल नहीं।…रोटी मेंड़ पर चलते-चलते ही खा लेना।”

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Thursday, 27 May 2010

गुब्बारा


डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति


गली में से गुब्बारेवाला रोज गुजरता। वह बाहर खड़े बच्चों को गुब्बारा पकड़ा देता और बच्चा माँ-बाप को दिखाता। फिर बच्चा खुद ही पैसे दे आता, या उसके माँ-बाप। इसी तरह एक दिन मेरी बेटी से हुआ। मैं उठकर बाहर गया और गुब्बारे का एक रुपया दे आया। दूसरे दिन फिर बेटी ने वैसा ही किया।मैने कहा, “बेटे, क्या करना है गुब्बारा? रहने दे न!” पर वह कहाँ मानती थी, रुपया ले ही गई। तीसरे दिन जब रुपया दिया तो लगा कि भई रोज-रोज तो यह काम ठीक नहीं। एक रुपया रोज महज दस मिनट के लिए। अभी फट जाएगा।
मैने आराम से बैठकर बेटी को समझाया, “बेटे! गुब्बारा कोई खाने की चीज है? नहीं न! एक मिनट में ही फट जाताहै। गुब्बारा अच्छा नहीं होता। अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते। हम बाजार से कोई अच्छी चीज लेकर आएंगे।”
अगले दिन जब गुब्बारेवाले की आवाज गली से आई तो बेटी बाहर न निकली और मेरी तरफ देखकर कहने लगी, “गुब्बारा अच्छा नहीं होता। भैया रोज ही आ जाता है। मैं उसे कह आऊँ कि वह चला जाए।”
“वह आप ही चला जाएगा।” मैने कहा। वह बैठ गई।
उससे अगले दिन गुब्बारेवाले की आवाज सुनकर वह बाहर जाने लगी तो मुझे देख बोली, “मैं गुब्बारा नहीं लूँगी।” और वह वापस आई तो, “अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते न? राजू तो अच्छा बच्चा नहीं है। गुब्बारा तो मिनट में फट जाता है।” कहती हुई अपनी मम्मी के पास रसोई में चली गई और उससे बोली, “मम्मी जी, मुझे गुब्बारा ले दो न!”

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Monday, 24 May 2010

अंधेरा






कुलजीत ग़ज़ल


उस दिन बस कुछ ज्यादा ही लेट हो गई थी। सर्दी के कारण सूरज के धुंध में छिपने से एकदम अंधेरा हो गया था। मन में डर था कि आज घर के सदस्यों ने मुझे नहीं छोड़ना। खैर! डरते-डरते अभी मैने घर के दरवाजे के भीतर पाँव रखा ही था कि सारा परिवार मेरी तरफ खा जाने वाली नज़रों से देखने लगा।

माँ मेरे पास आई और बिना कुछ कहे खींच कर ऐसा थप्पड़ मेरी गाल पर जड़ा कि मैं चकरा कर जमीन पर जा गिरी। किताबें मेरे हाथ से छूट कर जमीन पर गिर गईं। साथ खड़ा मेरा बाप भी लाल-पीला हो रहा था, “आई है इस समय, क्या कहते होंगे लोग? फलां की बहन-बेटी इस समय सड़कों पर घूमती-फिरती है, शर्म नहीं आती इसे।”

“बता कलमुंही, तुझे हमारी इज्जत का कुछ ख्याल भी है या नहीं?” माँ ने मुझे बेदर्दी से झिंझोड़ा।

भाई ने भी माथे पर सौ शिकन डाल कर मुँह फेर लिया और मैं पत्थर बनी उनके सामने निरुत्तर हो गई थी।

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Thursday, 13 May 2010

रिश्ते

यादविंदर सिद्धू

“अरे तू बड़ा मास्टर बना फिरता है, मुझे भी कोई चार अक्षर सिखा दे।” दीपी ने अपने छोटे देवर से कहा।
“पढ़ा देता हूँ भाभी, यह कौन सी बड़ी बात है।” वह खचरी हंसी हंसता है।
“अच्छा मैं पढ़ने बैठ रही हूँ।” दीपी किताब खोल कर बैठ जाती है।
“मास्टर जी, यह क्या है?” दीपी एक अक्षर पर उंगली रख कर पूछती है।
“भाभी, तुम बहुत सुंदर हो।”
“मास्टर जी, अब मैं आपकी भाभी नहीं, विद्यार्थी हूँ।”
“अच्छा-अच्छा, भाभी सच-सच बताना रात को जब तुम बिजली…”
“मैने कहा जी, अब आप मास्टर हो और मैं…”
“तब तुम्हें मेरा ख्याल…”
वह कुछ कह ही रहा था कि दीपी का थप्पड़ उसके मुंह पर पड़ा। वह बोली, “स्कूल में भी यही करतूतें करता होगा।बड़ा मास्टर बना फिरता है! लच्छन देखो इस की मास्टरी के।”
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Saturday, 1 May 2010

लोकतंत्र



अमर गम्भीर

गाड़ी तेज रफ्तार से मंजिल की ओर बढ़ रही थी। डिब्बे में बैठी सवारियां अपनी बातों में मस्त थीं।

“मेरा दिल करता है, जंजीर खींचूं।” एक यात्री बोला।

“क्यों?”

“बस मन करता है।” उसने अपनी इच्छा प्रकट की।

और फिर सबने मिल कर फैसला किया, “इसे जंजीर खींच लेने दो। सभी मिलकर जुर्माने की रकम अदा कर देंगे।”

सभी सहमत थे, पर एक असहमत था।

“मैं क्यों दूँ पैसे! यह क्यों खींचे जंजीर…करे कोई, भरे कोई, यह कहाँ का नियम है?”

पर तब तक यात्री जंजीर खींच चुका था। जंजीर खींचते ही गाड़ी रुक गई। गार्ड उस डिब्बे में दाखिल हुआ। सभी ने मिल कर उस व्यक्ति पर दोष लगा दिया, जिसने उनकी हाँ में हाँ नहीं मिलाई थी।

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Monday, 5 April 2010

आसरा



सुरिन्द्र कैले

उम्र भर की नौकरी से पैसै-पैसा जोड़, उसने बढ़िया कोठी बनाने की तमन्ना पूरी कर ली। नौकरी से निवृत्त होने के पश्चात वह उस कोठी में रहने लगा। पेंशन घर का खर्च पूरा नहीं कर पाती थी। शहर से मिलने आए बहू-बेटे को अपनी आर्थिक-तंगी के बारे में बताते हुए उसने सहायता की आस की।
“पिताजी, बड़े शहर के खर्चों का तो तुम्हें पता ही है। बड़ी मुश्किल से गुजर होती है, नहीं तो मैं कुछ न कुछ जरूर भेजता रहता।” बेटे ने असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा, “हाँ, अगर आप यह कोठी किराये पर दे दो और खुद पीछे बने दो कमरों में रिहायश कर लो तो कम से कम चार हजार रुपये महीने की आमदन हो सकती है।”
“मैं ऐसा नहीं कर सकता। बढ़िया कोठी में रहने की रीझ का गला नहीं घोंट सकता।” वह कोठी किराये पर देने को तैयार नहीं था।
“ऐसा करने से आपकी सभी चिंताएं समाप्त हो जाएंगी।” बहू ने पति की बात का समर्थन किया।
उसने ‘न’ में सिर हिलाया तथा शयन-कक्ष में चला गया।
अगले दिन बहू-बेटा दिल्ली चले गए।
उसने सोच-विचार किया तथा कोठी किराये पर चढ़ा दी।
“तुम उदास क्यों हो? अब अपने को कोई फिक्र नहीं। किसी के मुँह की ओर देखने की जरूरत नहीं, चिंता दूर हो गई।” सर्वेंट क्वाटर में सामान टिकाते हुए पत्नी ने दिलासा दिया।
“बुढ़ापे में बच्चे सहारा न दे सके, इस बेजान कोठी ने आसरा दे दिया।” उसने सहमत होते हुए कहा।
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