Thursday, 10 June 2010

साक्षरता आंदोलन


टेक ढींगरा ‘चँद’

गाँव में साक्षरता आंदोलन बड़े जोर-शोर से चल रहा था। गाँव की पंचायत ने इस संबंधी व्यापक प्रबंध किए हुए थे। गाँव में से एक जुलूस निकाला जा रहा था। जुलूस में नारे लग रहे थे।
“हाली-पाली करे कमाई, साथ-साथ वह करे पढ़ाई।”
“आप पढ़ो, दूजों को पढ़ाओ, अनपढ़ता को जड़ से मिटाओ।”
नारे लगा रहे सरपंच गुरबख्श सिंह का हाथ अचानक ऊपर उठने से रुक गया। उसने देखा कि उसके सीरी का बेटा तख्ती-बस्ता उठाए जा रहा था। उसने तुरंत आवाज लगाई, “ओ गोलू, किधर मुँह उठाए जा रहा है?”
गोलू सहम गया, “मैं…मैं…।”
“यह क्या बकरी की तरह मैं-मैं लगाई है।” सरपंच की आवाज तेज थी।
“मैं…मैं…पढ़ने जा रहा हूँ…।” गोलू सहमा-सा बोला।
“साला पढ़ने का।” सरपंच ने खींचकर एक थप्पड़ गोलू के गाल पर लगाया।
गोलू के तख्ती-बस्ता गिर गए।
“तुझे पता नहीं, पशु धूप में सड़ रहे हैं। उन्हें छाँव में मैं करूँगा? सरपंच गुस्से में बोला, “चल, घर जा कर पशुओं को छाँव में कर और चारा डाल।”
गोलू रोता हुआ तख्ती-बस्ता उठा, घर की ओर भाग लिया।
सरपंच फिर से काफ़िले में जा जुड़ा। वह पहले से भी अधिक जोर से नारे लगाने लगा, “हाली-पाली करे कमाई, साथ-साथ वह करे पढाई।”
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Thursday, 3 June 2010

आराम की रोटी


जसवीर राणा


‘लगता है तीन बज चले होंगे! …सूरज भी ढल गया!…पर सरदार अब तक रोटी लेकर नहीं आया…।’ चहबच्चे की मुंडेर पर बैठे नीलू ने सूरज की ओर देखा।

एक क्षण के लिए उसके चेहरे पर अफसोस-सा पसर गया। लेकिन अगले ही पल उसे चारपाई पर पड़े बीमार बाप की बात याद आई–‘नीलू बेटा! आज काम कर आ बस। ’गर न गए तो सरदार दिहाड़ी काट लेगा।…और फिर आज तू आराम की रोटी तो खा लेगा।…घर पर तो तुझे पता ही है, पूड़े पकते हैं रोज…!’

बापू की बात मान कर वह सवेरे ही सरदार के खेत में आ गया था। आते ही उसने बताए अनुसार क्यारों में पानी छोड़ दिया। पानी का रास्ता बदलते-बदलते वह हाल से बेहाल हो गया। भूख से उसके पेट में चूहे दौड़ने लग गए। तीन बजने वाले हो गए, मगर अभी तक न सवेर की, न दोपहर की रोटी आई थी।

“नीलू, ये ले पकड़ रोटी!”

भूख का मरसिया पढ़ रहे नीलू ने सिर घुमा कर पीछे देखा, सरदार रोटी लिए खड़ा था। इससे पहले कि वह कुछ बोलता, सरदार ने फटाफट कपड़े में से दो-तीन रोटियाँ निकाली। रोटियों पर अचार रख, उसके हाथों में पटकते हुए उसने हुक्म जारी किया, “कस्सी उठा और क्यारों के चारों ओर चक्कर लगा। बैठना बिलकुल नहीं।…रोटी मेंड़ पर चलते-चलते ही खा लेना।”

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Thursday, 27 May 2010

गुब्बारा


डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति


गली में से गुब्बारेवाला रोज गुजरता। वह बाहर खड़े बच्चों को गुब्बारा पकड़ा देता और बच्चा माँ-बाप को दिखाता। फिर बच्चा खुद ही पैसे दे आता, या उसके माँ-बाप। इसी तरह एक दिन मेरी बेटी से हुआ। मैं उठकर बाहर गया और गुब्बारे का एक रुपया दे आया। दूसरे दिन फिर बेटी ने वैसा ही किया।मैने कहा, “बेटे, क्या करना है गुब्बारा? रहने दे न!” पर वह कहाँ मानती थी, रुपया ले ही गई। तीसरे दिन जब रुपया दिया तो लगा कि भई रोज-रोज तो यह काम ठीक नहीं। एक रुपया रोज महज दस मिनट के लिए। अभी फट जाएगा।
मैने आराम से बैठकर बेटी को समझाया, “बेटे! गुब्बारा कोई खाने की चीज है? नहीं न! एक मिनट में ही फट जाताहै। गुब्बारा अच्छा नहीं होता। अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते। हम बाजार से कोई अच्छी चीज लेकर आएंगे।”
अगले दिन जब गुब्बारेवाले की आवाज गली से आई तो बेटी बाहर न निकली और मेरी तरफ देखकर कहने लगी, “गुब्बारा अच्छा नहीं होता। भैया रोज ही आ जाता है। मैं उसे कह आऊँ कि वह चला जाए।”
“वह आप ही चला जाएगा।” मैने कहा। वह बैठ गई।
उससे अगले दिन गुब्बारेवाले की आवाज सुनकर वह बाहर जाने लगी तो मुझे देख बोली, “मैं गुब्बारा नहीं लूँगी।” और वह वापस आई तो, “अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते न? राजू तो अच्छा बच्चा नहीं है। गुब्बारा तो मिनट में फट जाता है।” कहती हुई अपनी मम्मी के पास रसोई में चली गई और उससे बोली, “मम्मी जी, मुझे गुब्बारा ले दो न!”

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Monday, 24 May 2010

अंधेरा






कुलजीत ग़ज़ल


उस दिन बस कुछ ज्यादा ही लेट हो गई थी। सर्दी के कारण सूरज के धुंध में छिपने से एकदम अंधेरा हो गया था। मन में डर था कि आज घर के सदस्यों ने मुझे नहीं छोड़ना। खैर! डरते-डरते अभी मैने घर के दरवाजे के भीतर पाँव रखा ही था कि सारा परिवार मेरी तरफ खा जाने वाली नज़रों से देखने लगा।

माँ मेरे पास आई और बिना कुछ कहे खींच कर ऐसा थप्पड़ मेरी गाल पर जड़ा कि मैं चकरा कर जमीन पर जा गिरी। किताबें मेरे हाथ से छूट कर जमीन पर गिर गईं। साथ खड़ा मेरा बाप भी लाल-पीला हो रहा था, “आई है इस समय, क्या कहते होंगे लोग? फलां की बहन-बेटी इस समय सड़कों पर घूमती-फिरती है, शर्म नहीं आती इसे।”

“बता कलमुंही, तुझे हमारी इज्जत का कुछ ख्याल भी है या नहीं?” माँ ने मुझे बेदर्दी से झिंझोड़ा।

भाई ने भी माथे पर सौ शिकन डाल कर मुँह फेर लिया और मैं पत्थर बनी उनके सामने निरुत्तर हो गई थी।

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Thursday, 13 May 2010

रिश्ते

यादविंदर सिद्धू

“अरे तू बड़ा मास्टर बना फिरता है, मुझे भी कोई चार अक्षर सिखा दे।” दीपी ने अपने छोटे देवर से कहा।
“पढ़ा देता हूँ भाभी, यह कौन सी बड़ी बात है।” वह खचरी हंसी हंसता है।
“अच्छा मैं पढ़ने बैठ रही हूँ।” दीपी किताब खोल कर बैठ जाती है।
“मास्टर जी, यह क्या है?” दीपी एक अक्षर पर उंगली रख कर पूछती है।
“भाभी, तुम बहुत सुंदर हो।”
“मास्टर जी, अब मैं आपकी भाभी नहीं, विद्यार्थी हूँ।”
“अच्छा-अच्छा, भाभी सच-सच बताना रात को जब तुम बिजली…”
“मैने कहा जी, अब आप मास्टर हो और मैं…”
“तब तुम्हें मेरा ख्याल…”
वह कुछ कह ही रहा था कि दीपी का थप्पड़ उसके मुंह पर पड़ा। वह बोली, “स्कूल में भी यही करतूतें करता होगा।बड़ा मास्टर बना फिरता है! लच्छन देखो इस की मास्टरी के।”
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Saturday, 1 May 2010

लोकतंत्र



अमर गम्भीर

गाड़ी तेज रफ्तार से मंजिल की ओर बढ़ रही थी। डिब्बे में बैठी सवारियां अपनी बातों में मस्त थीं।

“मेरा दिल करता है, जंजीर खींचूं।” एक यात्री बोला।

“क्यों?”

“बस मन करता है।” उसने अपनी इच्छा प्रकट की।

और फिर सबने मिल कर फैसला किया, “इसे जंजीर खींच लेने दो। सभी मिलकर जुर्माने की रकम अदा कर देंगे।”

सभी सहमत थे, पर एक असहमत था।

“मैं क्यों दूँ पैसे! यह क्यों खींचे जंजीर…करे कोई, भरे कोई, यह कहाँ का नियम है?”

पर तब तक यात्री जंजीर खींच चुका था। जंजीर खींचते ही गाड़ी रुक गई। गार्ड उस डिब्बे में दाखिल हुआ। सभी ने मिल कर उस व्यक्ति पर दोष लगा दिया, जिसने उनकी हाँ में हाँ नहीं मिलाई थी।

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Monday, 5 April 2010

आसरा



सुरिन्द्र कैले

उम्र भर की नौकरी से पैसै-पैसा जोड़, उसने बढ़िया कोठी बनाने की तमन्ना पूरी कर ली। नौकरी से निवृत्त होने के पश्चात वह उस कोठी में रहने लगा। पेंशन घर का खर्च पूरा नहीं कर पाती थी। शहर से मिलने आए बहू-बेटे को अपनी आर्थिक-तंगी के बारे में बताते हुए उसने सहायता की आस की।
“पिताजी, बड़े शहर के खर्चों का तो तुम्हें पता ही है। बड़ी मुश्किल से गुजर होती है, नहीं तो मैं कुछ न कुछ जरूर भेजता रहता।” बेटे ने असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा, “हाँ, अगर आप यह कोठी किराये पर दे दो और खुद पीछे बने दो कमरों में रिहायश कर लो तो कम से कम चार हजार रुपये महीने की आमदन हो सकती है।”
“मैं ऐसा नहीं कर सकता। बढ़िया कोठी में रहने की रीझ का गला नहीं घोंट सकता।” वह कोठी किराये पर देने को तैयार नहीं था।
“ऐसा करने से आपकी सभी चिंताएं समाप्त हो जाएंगी।” बहू ने पति की बात का समर्थन किया।
उसने ‘न’ में सिर हिलाया तथा शयन-कक्ष में चला गया।
अगले दिन बहू-बेटा दिल्ली चले गए।
उसने सोच-विचार किया तथा कोठी किराये पर चढ़ा दी।
“तुम उदास क्यों हो? अब अपने को कोई फिक्र नहीं। किसी के मुँह की ओर देखने की जरूरत नहीं, चिंता दूर हो गई।” सर्वेंट क्वाटर में सामान टिकाते हुए पत्नी ने दिलासा दिया।
“बुढ़ापे में बच्चे सहारा न दे सके, इस बेजान कोठी ने आसरा दे दिया।” उसने सहमत होते हुए कहा।
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Tuesday, 30 March 2010

एहसास


गुरमेल मडाहड़


शादी से पहिले वे जब भी एक-दूसरे से मिलते, तो जसजीत वीना के जूड़े में बड़े प्यार से फूल लगाता। वह उसे काफी देर तक सहलाती रहती और कहती, “जसजीत, मुझे एक बेटा दे दे, बिलकुल तुम जैसी अक्ल-शक्ल हो।”

“फिक्र न कर, तेरी यह इच्छा भी जल्दी ही पूरी हो जाएगी।” जसजीत कहता।

फिर उनकी शादी हो गई। शादी के बाद उसे कई बार माँ बनने की आशा हुई, पर बार-बार वह बीमार पड़ती रही। इस बीच जसजीत फूल-वूल लगाना सब भूल गया। उसे हर समय वीना की चिंता खाए रहती थी। कई डॉक्टर बदलने के बाद आखिर वे सफल हो ही गए। उनके घर बेटे ने जन्म लिया। जसजीत बहुत खुश था। उसने बच्चे को खूब प्यार किया, वीना को मुबारकबाद दी और उसके जूड़े में फूल लगाने लगा।

वीना बोली, “जसजीत, अब मेरे यह फूल न लगाया कर।”

“क्यो? अब मेरा फूल लगाना तुझे अच्छा नहीं लगता?”

“नहीं, यह बात नहीं।”

“फिर?”

“फूल तोड़ने के लिए नहीं, देखने और प्यार करने के लिए होते हैं।”

“अच्छा!”

“हाँ…कोई फूल कितनी मुश्किलों के बाद खिलता है, यह एक माँ ही जान सकती है, कोई और नहीं।”

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Thursday, 25 March 2010

मन्नत



अवतार सिंह कंवर

“ए सीबो, तूने मुझे बताया ही नहीं कि तेरी माँ मेले में जाएगी!”
“चाची, बस अचानक ही तैयारी हो गई। मैंने तो कहा था कि क्या लेना है मेले में, पर माँ नहीं मानी। बोली—पाँचपीरों की समाधि पर माथा टेक आऊँगी। मन्नत की थी तेरे भाई की, जब उसे मियादी बुखार हुआ था।”
“अच्छा!”
“जब मैंने कहा—माँ, भैया को तो शहर के डॉक्टर से आराम आया था, तो कहने लगी—तेरा सिर आया था! बीमारी नेमोड़ तो उसी दिन लिया, जब पीरों की मन्नत मानी।”
“सीबो, बात तो तेरी माँ की ठीक है, और मन्नत का भार भी उठाकर नहीं रखना चाहिए। जब जगीरो की बहू केबच्चा होने वाला था, उसने मन्नत मानी, लेकिन पूरा करना भूल गई। अढ़ाई महीने का होकर, लड़का मर गया।फिर रोए, मैंने तो पाँच पीरों की कड़ाही करनी थी।”
“चाची, भला हुआ क्या था लड़के को?”
चाची गला साफ करते हुए बोली, “क्या बताऊँ बेटी, सब कर्मों का खेल है! बुखार चढ़ा और ले डूबा लड़के को।”
“इलाज नहीं करवाया उन्होंने?”
“बेटी, अपनी ओर से तो कौन कसर छोड़ता है। बहुत भागदौड़ की बेचारों ने। अपने नागा साधु के पास गए–मंत्रफुंकवाया, भस्म भी लगाई। और जहाँ किसी भी सयाने का पता चला, वहीं गए। लेकिन कहीं से भी आराम नहींआया।”
“उसे किसी डॉक्टर के पास लेकर गए चाची?”
“तू तो पढ़-लिखकर भी पागल ही रही। लड़के को तो छाया थी। डॉक्टर उसमें क्या करता! कोप तो सारा मनौती काथा।”
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Monday, 8 March 2010

चिंता

अमरजीत हांस

वह सहमी-सी हमारे पास जम्बो सर्कस में आ बैठी। चारों ओर देखते हुए वह मेरी पत्नी से बातें करने लगी। उसके सुंदर चेहरे पर उदासी झलक रही थी। दर्द भरी आवाज में वह बोली, “बहन जी, मेरा आदमी भी वहाँ सामने बैठा है।”
हम दोनों आश्चर्य से एक साथ बोले, “आप उनके साथ क्यों नहीं आईं?”
आँसू पोंछती हुई वह बोली, “उसके साथ एक और है, लाल सूट वाली। मेरा बेटा भी है उसकी गोद में।”
“आप उसे रोकती क्यों नहीं?” मेरी पत्नी ने चिंता प्रकट की।
“बहन जी नहीं मानता वह। पता नहीं कंजरी ने उसके सिर में क्या धूड़ दिया है। वह है भी हमारे गाँव की।”
हमदर्दी जतलाते हुए मेरी पत्नी ने कहा, “यह तो बहुत बुरी बात है, आप अपने माता-पिता से कहो।”
वह औरत चिंता प्रकट करते हुए बोली, “बहन जी, अकेला ही है। अगर मैंने भाइयों को बता दिया तो कहीं कुछ खाकर मर न जाए”
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