Tuesday, 19 February 2013

क्या…?



अनवंत कौर

बहू के हाथ से कांच के बर्तनों वाली ट्रे गिर गई। दोष उसका नहीं था। सफेद मार्बल के फर्श पर गिरा पानी नज़र नहीं आ रहा था। पाँव फिसल गया। स्वयं तो किसी तरह सँभल गई, पर ट्रे गिर गई। कांच के दो गिलास व दो प्लेटें टूट गईं।
खड़का सुन, हर समय घुटनों के दर्द का रोना रोने वाली उसकी सास भागती हुई आई। कांच के टुकड़ों जितनी ही गालियों के टुकड़े, उसकी जबान से गोलियों की तरह बरसने लगे– “अरी ओ घर की दुश्मन, तेरा सर्वनाश हो! तू इस घर का बेड़ा गर्क करके रहेगी। भूखों की औलाद, पीछे तो कुछ देखा नहीं। अब यह भरा-पूरा घर तुझसे बर्दाश्त नहीं होता। यूं कर, अलमारी में जो क्राकरी पड़ी है, वह भी ले आ और सारी एक बार में ही तोड़ दे। जब तक तुझे एक भी प्लेट साबुत नज़र आएगी, तुझसे बर्दाश्त नहीं होगा।”
पत्नी की कठोर आवाज़ व गालियाँ सुनकर ससुर भी अपने कमरे से बाहर निकल आया। कुछ पूछने की ज़रूरत नहीं थी। कांच के टुकड़े व बहू की आँखों के आँसू और पत्नी की गालियाँ, सब कुछ बयान कर रहे थे।
वह बोले, “इसका क्या कसूर है? पाँव तो किसी का भी फिसल सकता है। गिलास ही हैं और जाएँगे।”
“आपने तो जबान हिला दी…और आ जाएँगे! महीने में एक बार तनख़ाह लाकर देते हो दोनों बाप-बेटे। मुझे ही पता है कि इस महँगाई के जमाने में घर का खर्च किस तरह चलाती हूँ। मुझे तो तीस दिन एक-एक पाई सोच कर खर्च करनी पड़ती है।”
“अच्छा! इस तरफ तो हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया। आज से तुम्हें यह तकलीफ उठाने की ज़रूरत नहीं। पढ़ी-लिखी बहू आई है, आप ही बजट बनाकर घर चला लेगी। आगे से तनख़ाह इसके हाथों में दिया करेंगे।”
“क्…क्या…?”
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Tuesday, 12 February 2013

बिरादरी



गुरचरण चौहान

ताँगेवाले ऊड़ी व जूली का आज फिर झगड़ा हो गया। सुबह गाँव में हुए फैसले के अनुसार, ताँगे की पहली फेरी आज जूली को ले जानी थी। पर जूली के घर में क्लेश के चलते वह अड्डे पर जरा देर से आया। उसके आने से पहले ऊड़ी ने अड्डे पर खड़ी सवारियाँ अपने ताँगे पर बैठा लीं। जब जूली अपना ताँगा लाया तो वह ऊड़ी के गले पड़ गया।
“आज पहली फेरी लगाने की बारी मेरी थी, तू कैसे?” ऊड़ी की रग-रग में गुस्सा बोल रहा था।
“अगर तू बारह बजे तक घर सोया रहेगा तो मैं तेरा इंतजार करता रहूँगा!”
बात ‘तू-तू, मैं-मैं’ से होती हुई आगे बढ़ गई। ऊड़ी ने जूली को गले से पकड़ लिया। अड्डे पर खड़े लोगो ने उन्हें छुड़ाया और सवारियाँ ऊड़ी के ताँगे से उतरवा कर जूली के ताँगे में बिठा दीं।
कुछ देर बाद एक ऑटोवाला शहर से आया और गाँव में सवारियाँ उतार कर अड्डे पर आ खड़ा हुआ। ऑटोवाला जूली के ताँगे पर बैठी सवारियों को इशारे से ऑटो में बैठने के लिए उकसाने लगा।
“हम तो अभी चले हैं, दस मिनटों में मण्डी…आओ बैठो।” वह ऑटो को रेस पर रेस दिए जा रहा था।
जूली तो अभी खड़ा सोच ही रहा था, पर ऊड़ी ने भागकर फुर्ती से ऑटोवाले को बाहर घसीट लिया और उस पर साँटा बरसाने लगा। लोगों ने उसे बहुत मुश्किल से हटाया।
“यूँ ही दिमाग हिला हुआ है…पहले जूली से लड़ा और अब टैम्पू वाले के गले पड़ गया।” बिशनी दूसरी सवारियों को कह रही थी।
“ताई, अगर ये टैम्पू वाले यूँ ही हमारी सवारियों को ले जाने लगे तो हमारा क्या बनेगा? जूली से तो मैं फिर भी निपट लूँगा।” ऊड़ी ताँगे के पायदान पर पाँव रखता हुआ कह रहा था।
ऑटोवाला कब का शहर को रवाना हो चुका था।
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Tuesday, 5 February 2013

स्वाभिमान



राजिन्द्र कौर ‘वंता’

शक्ल-सूरत से वह नौजवान रिक्शाचालक पढ़ा-लिखा दिखाई देता था। रिक्शा में बैठे, मैंने देखा कि उसकी कमीज कई स्थानों से फटी हुई है। ऐसा लगता था कि कमीज की मरम्मत कई बार हो चुकी थी, लेकिन कमीज जैसे फटे रहने पर बजिद्द थी।
‘कितनी ही नई कमीजें मेरी अलमारी में झूल रही हैं। क्यों न एक-आध इसे दे दूँ।’ मैंने स्वयं से कहा।
जब रिक्शा मेरे घर के सामने रुकी तो मैंने झिझकते हुए कहा, “भैया, तुम्हारी कमीज की हालत बहुत खस्ता है, अगर बुरा न मानो तो एक मिनट ठहरो, मैं भीतर से एक कमीज ला देता हूँ।”
“नहीं सरदार जी, फटी हुई कमीज तो मैंने जानबूझकर पहनी है। इसमें गरमी कम लगती है।” मुस्कराते हुए उसने रिक्शा आगे बढ़ा दिया।
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Monday, 28 January 2013

माँ का कमरा




श्याम सुन्दर अग्रवाल

छोटे-से पुश्तैनी मकान में रह रही बुज़ुर्ग बसंती को दूर शहर में रहते बेटे का पत्र मिला- ‘माँ, मेरी तरक्की हो गई है। कंपनी की ओर से मुझे बहुत बड़ी कोठी मिली है, रहने को। अब तो तुम्हें मेरे पास शहर में आकर रहना ही होगा। यहां तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी।
पड़ोसन रेशमा को पता चला तो वह बोली, “अरी रहने दे शहर जाने को। शहर में बहू-बेटे के पास रहकर बहुत दुर्गति होती है। वह बसंती गई थी न, अब पछता रही है, रोती है। नौकरों वाला कमरा दिया है, रहने को और नौकरानी की तरह ही रखते हैं। न वक्त से रोटी, न चाय। कुत्ते से भी बुरी जून है।”
अगले ही दिन बेटा कार लेकर आ गया। बेटे की ज़िद के आगे बसंती की एक न चली। ‘जो होगा देखा जावेगा’ की सोच के साथ बसंती अपने थोड़े-से सामान के साथ कार में बैठ गई।
लंबे सफर के बाद कार एक बड़ी कोठी के सामने जाकर रुकी।
“एक ज़रूरी काम है माँ, मुझे अभी जाना होगा।” कह, बेटा माँ को नौकर के हवाले कर गया। बहू पहले ही काम पर जा चुकी थी और बच्चे स्कूल।
बसंती कोठी देखने लगी। तीन कमरों में डबल-बैड लगे थे। एक कमरे में बहुत बढ़िया सोफा-सैट था। एक कमरा बहू-बेटे का होगा, दूसरा बच्चों का और तीसरा मेहमानों के लिए, उसने सोचा। पिछवाड़े में नौकरों के लिए बने कमरे भी वह देख आई। कमरे छोटे थे, पर ठीक थे। उसने सोचा, उसकी गुज़र हो जाएगी। बस बहू-बेटा और बच्चे प्यार से बोल लें और दो वक्त की रोटी मिल जाए। उसे और क्या चाहिए।
नौकर ने एक बार उसका सामान बरामदे के साथ वाले कमरे में टिका दिया। कमरा क्या था, स्वर्ग लगता था- डबल-बैड बिछा था, गुस्लखाना भी साथ था। टी.वी. भी पड़ा था और टेपरिकार्डर भी। दो कुर्सियां भी पड़ी थीं। बसंती सोचने लगी- काश! उसे भी कभी ऐसे कमरे में रहने का मौका मिलता। वह डरती-डरती बैड पर लेट गई। बहुत नर्म गद्दे थे। उसे एक लोककथा की नौकरानी की तरह नींद ही न आ जाए और बहू आकर उसे डांटे, सोचकर वह उठ खड़ी हुई।
शाम को जब बेटा घर आया तो बसंती बोली, “बेटा, मेरा सामान मेरे कमरे में रखवा देता.”
बेटा हैरान हुआ, “माँ, तेरा सामान तेरे कमरे में ही तो रखा है नौकर ने।”
बसंती आश्चर्यचकित रह गई, “मेरा कमरा ! यह मेरा कमरा !! डबल-बैड वाला…!”
“हां माँ, जब दीदी आती है तो तेरे पास सोना ही पसंद करती है। और तेरे पोता-पोती भी सो जाया करेंगे तेरे साथ। तू टी.वी. देख, भजन सुन। कुछ और चाहिए तो बेझिझक बता देना।” उसे आलिंगन में ले बेटे ने कहा तो बसंती की आँखों में आँसू आ गए।
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