Saturday, 18 February 2012

तरह-तरह के लोग


दर्शन मितवा

मैं एक भयंकर स्थिति में फंसकर एक  लाइन में खड़ा हूँ और काँप रहा हूँ। मेरे साथ घटने वाली यह घटना मेरी सूरत के कारण है या मौजूदा माहौल के कारण, मुझे समझ नहीँ आ रही है। मेरे चेहरे पर उगी लंबी दाढ़ी हवा में बेखौफ उड़-उड़कर मेरे गाल थपथपा रही है। मुझे इससे मोह है। सिर पर कटिंग किए बालों से मुझे इश्क है।
शहरवालों का रवैया मेरे प्रति कुछ अजीब-सा है। प्रायः दो तरह के लोगों से ही पाला पड़ता रहा है। पहली तरह के लोग मुझे सलाह देते हैं, यार, ये दाढ़ी कटवा दे। अपने लोगों के ये अच्छी नहीं लगती।
दूसरी तरह के लोग मुझे हमेशा यही नसीहत देते हैं, दाढ़ी तो रख ही ली, अब सिर पर पगड़ी भी बाँध लिया कर।
इन दोनों तरह के लोगों को प्रायः मैं अनसुना, अनदेखा कर देता हूँ।
बीते दिनों एक तीसरी तरह के लोगों से मेरा पाला पड़ा। मैं शहर की सड़क पर चला जा रहा था कि तेजी से आ रही एक जीप अचानक मेरे सामने आकर रुकी। उसमें से एक पुलिस अफसर तथा कुछ सिपाही फुर्ती से उतरे और उन्होंने मुझे उठाकर जबरन जीप में डाल लिया, तेरा ख्याल है कि सिर के केस कटवाकर तू हमसे बचकर निकल जाएगा!
किसी तरह ले-देकर इन तीसरी तरह के लोगों से मैंने अपना पीछा छुड़ाया था।
परंतु आज इससे भी बड़ी घटना घट गई है और मैं मुश्किल में फँसा लाइन में खड़ा थर-थर काँप रहा हूँ।
तू क्या समझता है कि दाढ़ी रखकर हमें धोखा देकर निकल जाएगा?
स्टेनगन थामे ये चौथी तरह के लोग खाड़कू(उग्रवादी) हैं।
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1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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कल शाम से नेट की समस्या से जूझ रहा था। इसलिए कहीं कमेंट करने भी नहीं जा सका। अब नेट चला है तो आपके ब्लॉग पर पहुँचा हूँ!
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!