Sunday, 3 January 2010

बोहनी



रणजीत कोमल

गर्मी पूरे जोरों पर थी। गाँव को जाती सड़क पर सिर्फ उसी की साइकिलों की मरम्मत की दुकान थी। परछाइयाँ ढलने पर थीं, पर अभी बोहनी ही नहीं की थी। उबासियां लेता वह ग्राहक का इंतजार कर रहा था। कभी वह बक्से में पड़े सामान की तरफ देखता और कभी सड़क की तरफ। उसे ग्राहक के आने की कोई आशा नज़र नहीं थी आ रही। उसे बार-बार बच्चों का ध्यान आ रहा था, जिन्हें दिहाड़ी कमा कर ही रात को खिलाना था।
अचानक ही एक बुजुर्ग रिक्शेवाला फूली सांस उसके पास आया।
“इसे देखना, यार! इसकी बस चलाते ही हवा निकल गई…।” पसीना पोंछते बुजुर्ग ने पिछले टायर की तरह इशारा करते हुए कहा।
टायर खोलने में दुकानदार ने एक मिनट भी नहीं लगाया। उसने ट्यूब चैक करनी शुरू की। एक साथ तीन पंक्चर देखकर दुकानदार के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
तीन पंक्चर देखकर बुजुर्ग का चेहरा मुरझा गया। आज तो बोहनी ही नहीं की कैसे चलेगा।
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6 comments:

श्यामल सुमन said...

असीम पीड़ा समेटे सुन्दर लघुकथा।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

राजीव तनेजा said...

बहुत ही कम शब्दों में आपने पीड़ा व्यक्त कर दी....सुन्दर लघुकथा

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अपना अपना दर्द है
है कहानी अपनी अपनी

प्रदीप मिश्र said...

sardi ke mausam mein garmi kee kahani kitnee sondi ban gayee hai. shandar parikalpana ke liy badhai.
www.bolaeto.blogspot.com

अनामिका की सदाये...... said...

kaisa dukh ka vishey hai ki ek ki bohni aur dusre ka bina bohni k jabardasti ka kharcha...kayi bar kitna dukhdayi hota hai ek ke chehre ki muskan dekhna dusre ke chehre par peeda la kar.

dam daar laghu kath k liye badhayi.

M VERMA said...

वाह बहुत सुन्दर लघुकथा. किसी का सुख ~ किसी का दुख.