Tuesday, 4 August 2015

उत्सव




श्याम सुन्दर अग्रवाल                    

सेना और प्रशासन की दो दिनों की जद्दोजेहद अंतत: सफल हुई। साठ फुट गहरे बोरवैल में फंसे नंगे बालक प्रिंस को सही सलामत बाहर निकाल लिया गया। वहाँ विराजमान राज्य के मुख्यमंत्री एवं जिला प्रशासन ने सुख की साँस ली। बच्चे के माँ-बाप व लोग खुश थे।
दीन-दुनिया से बेखबर इलैक्ट्रानिक मीडिया दो दिन से निरंतर इस घटना का सीधा प्रसारण कर रहा था। मुख्यमंत्री के जाते ही सारा मजमा खिंडने लगा। कुछ ही देर में उत्सव वाला माहौल मातमी-सा हो गया। टी.वी. संवाददाताओं के जोशीले चेहरे अब मुरझाए हुए लग रहे थे। अपना साजोसामान समेट कर जाने की तैयारी कर रहे एक संवाददाता के पास समीप के गाँव का एक युवक आया और बोला, “हमारे गाँव में भी ऐसा ही…”
युवक की बात पूरी होने से पहले ही संवाददाता का मुरझाया चेहरा खिल उठा, “क्या तुम्हारे गाँव में भी बच्चा बोरवैल में गिर गया?”
“नहीं।”
युवक के उत्तर से संवाददाता का चेहरा फिर से बुझ गया, “तो फिर क्या?”
“हमारे गाँव में भी ऐसा ही एक गहरा गड्ढा नंगा पड़ा है,” युवक ने बताया।
“तो फिर मैं क्या करूँ?” झुँझलाया संवाददाता बोला।
“आप महकमे पर जोर डालेंगे तो वे गड्ढा बंद कर देंगे। नहीं तो उसमें कभी
भी कोई बच्चा गिर सकता है।”
संवाददाता के चेहरे पर फिर थोड़ी रौनक दिखाई दी। उसने इधर-उधर देखा और अपने नाम-पते वाला कार्ड युवक को देते हुए धीरे से कहा, “ध्यान रखना, जैसे ही कोई बच्चा उस बोरवैल में गिरे मुझे इस नंबर पर फोन कर देना। किसी और को मत बताना। मैं तुम्हें इनाम दिलवा दूँगा।”
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Tuesday, 28 July 2015

आत्मा सिंह की मौत

सुलक्खन मीत

मक्खन सिंह जिस स्कूल में स्वयं पढ़ा था, वहीं वह अंग्रेजी के लैक्चरर के तौर पर ड्यूटी संभालने जा रहा था। वह सोच रहा था—‘अभी कल ही तो मैं उस स्कूल में पढ़ता था। तब यह केवल हाई स्कूल था। वहाँ के मुख्याध्यापक सरदार आत्मा सिंह बहुत ही परिश्रमी इंसान थे। सभी अध्यापक समय से स्कूल पहुँचते थे, समय से वापस जाते थे। पढ़ाने के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में भी दिलचस्पी लेते थे। हर वर्ष स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या पहले से अधिक होती।’
सोच में डूबा वह स्कूल पहुँच गया। उसे ऐसा लग रहा था जैसे स्कूल में अवकाश हो। न ही बाहर, न ही कमरों में कोई रौनक दिखाई देती थी। अवकाश का कोई कारण भी नज़र नहीं आ रहा था।
मक्खन सिंह ने दफ्तर में जाकर अपनी हाज़री-रिपोर्ट दे दी। जब वह स्टाफ-रूम में पहुँचा तो वहाँ का दृश्य बदला हुआ था। वहाँ बैठे लगभग सभी अध्यापक उसके लिए नए थे। पंजाबी का लैक्चरर मग्घर सिंह उस का हमजमाती था। उसने मक्खन सिंह को पहली नज़र में ही पहचान लिया। मक्खन ने देखा, वे सारे मेज के चारों ओर बैठे देसी शराब पी रहे थे। कमरे में रोस्टड मुर्गे की खुशबू फैली थी। मक्खन के चेहरे के हाव-भाव देखते हुए उसे अपने साथ वाली कुर्सी पर बैठाते हुए मग्घर सिंह ने पूछा, “मक्खन, फिर कैसा लगा स्कूल?”
मक्खन सिंह ने बेझिझक कहा, “मुझे तो ऐसा लगता है दोस्त, जैसे आज आत्मा सिंह मर गया हो।”
आत्मा सिंह के समय स्कूल में पढ़े अध्यापकों को उच्छू आ गई।
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Tuesday, 21 July 2015

ज़िंदगी




कुलविंदर कौशल

पिछले दिनों मेरी सहेली कमला के पति का निधन हो गया था। व्यस्तता के चलते मुझसे अफसोस प्रकटाने के लिए भी नहीं जाया गया। आज मुश्किल से समय निकाल उसके घर गई थी। कमला मुझे बहुत गर्मजोशी से मिली। मैं तो सोच रही थी कि वह मुरझा गई होगी, पूरी तरह टूट गई होगी। मगर ऐसा बिल्कुल नहीं लगा। उसके पति के बारे में बात करने पर वह चुप-सी हो गई। थोड़ी देर बाद गंभीर आवाज में बोली, “मर चुकों के साथ मरा तो नहीं जाता…।बच्चों के लिए मुझे साहस तो जुटाना ही होगा।”
 “हाँ, यह बात तो ठीक है, लेकिन अकेली औरत…” मैंने अपनी बात अभी पूरी भी नहीं की थी कि कमला की बच्ची रोती हुई हमारे पास आई।
“मम्मा, देखो बबलू ने मेरा घर ढा दिया।”
“रोते नहीं बेटे, मैं बबलू को मारूँगी। मेरी अच्छी बच्ची घर को फिर से बनाएगी, जाओ बनाओ।”
“हाँ मम्मा, मैं फिर से घर बनाऊँगी।” कहती हुई बच्ची बाहर भाग गई।
“क्या कह रही थी तुम…अकेली औरत?…मैं अकेली कहाँ हूँ। मेरे दो बच्चे हैं। देखना कुछ दिनों में ही बड़े हो जाएँगे।”
हम बहुत देर तक बातें करती रहीं। जब मैं कमला के घर से बाहर निकली तो देखा उसके बच्चे दोबारा घर बनाकर खेल रहे थे।
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