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Monday, 8 June 2015

औरत और मोमबत्ती



दर्शन मितवा

अच्छा तो इधर आ। वह औरत को घर के अंदर वाले कमरे में ले गया।
देख, यहाँ कितना अंधेरा हैऔर जब मुझे उजाले की जरूरत पड़ती है उसने जेब से दियासलाई निकाली और सामने कार्निश पर लगी मोमबत्ती जला दी।
कमरे में उजाला फैल गया।
देख, मुझे जब तक उजाला चाहिएयह जलती रहेगी।
वह औरत उसकी और देखती रही।
जब मुझे इसकी जरूरत नहीं होती तो…” कहते ही उसने मोमबत्ती को फूँक मार दी।
कमरे में अंधेरा पसर गया।
उस औरत ने उसके हाथ से दियासलाई की डिबिया ली और सामने कार्निश पर लगी मोमबत्ती फिर से जला दी।
पर, औरत कोई मोमबत्ती नहीं होती। उस औरत के होंठ हिले, जिसे जब जी चाहे गले से लगा लो और जब जी चाहे बुझा दो।
दोनों की नज़रें मिलीं।
“…समझे। और मैं एक औरत हूँ, मोमबत्ती नहीं।
वह आदमी चुप था।
औरत के चेहरे पर अनोखी चमक थी।
और अब मोमबत्ती जल रही थी।
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Thursday, 17 October 2013

साझेदार



दर्शन मितवा

दस-ग्यारह वर्ष का वह लड़का अपने साइकिल पर काबू न रख पाया। वह साइकिल समेत सड़क के बीच धड़ाम से गिर गया। साइकिल के पीछे खुरजी में लदी बोतलें बिखर गईं। कुछ तो टूट कर किरचों में बदल गईं।
देखने वाले खिलखिला कर हँस पड़े।
साले से अपन-आप सँभलता नहीं…नीचे सइकिल पहले दे लिया।पहला बोला।
ऐसे ही माँ-बाप हैं, जो यूँ ही बच्चे को जानबूझ कर मरने के लिए भेज देते हैं। अभी इसकी कोई उम्र है, साइकिल पर इतना भार खेंचने की…।दूसरे ने कहा।
तीसरे व्यक्ति ने भाग कर जल्दी से लड़के को खड़ा किया और पूछा, चोट तो नहीं लगी, बेटा?
उसे अपना बेटा मक्खन याद आया तो उसने सड़क पर बिखरी पड़ी खाली बोतलें उठा-उठाकर साइकिल की खुरजी में रखनी शुरू कर दीं।
साइकिल ध्यान से चलाया कर बेटा!उसने लड़के के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
खाली बोतलें, पीपियाँ-पीपे, रद्दी अखबार बेच लो…थोड़ी दूर जाकर उस लड़के ने हाँक लगाई। तब उस तीसरे व्यक्ति का मन संतुष्टि से भर गया जैसे गाँवों में साइकिल पर जाकर सब्ज़ी बेचने वाला उसका बेटा मक्खन हाँक लगा रहा हो, आलू, गोभी, बैंगन लो…।
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Saturday, 18 February 2012

तरह-तरह के लोग


दर्शन मितवा

मैं एक भयंकर स्थिति में फंसकर एक  लाइन में खड़ा हूँ और काँप रहा हूँ। मेरे साथ घटने वाली यह घटना मेरी सूरत के कारण है या मौजूदा माहौल के कारण, मुझे समझ नहीँ आ रही है। मेरे चेहरे पर उगी लंबी दाढ़ी हवा में बेखौफ उड़-उड़कर मेरे गाल थपथपा रही है। मुझे इससे मोह है। सिर पर कटिंग किए बालों से मुझे इश्क है।
शहरवालों का रवैया मेरे प्रति कुछ अजीब-सा है। प्रायः दो तरह के लोगों से ही पाला पड़ता रहा है। पहली तरह के लोग मुझे सलाह देते हैं, यार, ये दाढ़ी कटवा दे। अपने लोगों के ये अच्छी नहीं लगती।
दूसरी तरह के लोग मुझे हमेशा यही नसीहत देते हैं, दाढ़ी तो रख ही ली, अब सिर पर पगड़ी भी बाँध लिया कर।
इन दोनों तरह के लोगों को प्रायः मैं अनसुना, अनदेखा कर देता हूँ।
बीते दिनों एक तीसरी तरह के लोगों से मेरा पाला पड़ा। मैं शहर की सड़क पर चला जा रहा था कि तेजी से आ रही एक जीप अचानक मेरे सामने आकर रुकी। उसमें से एक पुलिस अफसर तथा कुछ सिपाही फुर्ती से उतरे और उन्होंने मुझे उठाकर जबरन जीप में डाल लिया, तेरा ख्याल है कि सिर के केस कटवाकर तू हमसे बचकर निकल जाएगा!
किसी तरह ले-देकर इन तीसरी तरह के लोगों से मैंने अपना पीछा छुड़ाया था।
परंतु आज इससे भी बड़ी घटना घट गई है और मैं मुश्किल में फँसा लाइन में खड़ा थर-थर काँप रहा हूँ।
तू क्या समझता है कि दाढ़ी रखकर हमें धोखा देकर निकल जाएगा?
स्टेनगन थामे ये चौथी तरह के लोग खाड़कू(उग्रवादी) हैं।
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Saturday, 22 January 2011

कलाकार


दर्शन मितवा
सड़क के किनारे मीठी और सोज़ भरी आवाज़ में कोई अंधा गा रहा है। उस के इर्द-गिर्द भीड़ जमा है। मैं भी भीड़ में हूँ।
एकत्र हुए लोग अंधे की तारीफ कर रहे हैं।
देखो कितना अच्छा गाता है…पर बेचारा अंधा है। कितनी मीठी और दर्दभरी आवाज़ है…बोल कलेजे को छूते चले जाते हैं।
भाई यह हिंदुस्तान है…और हिंदुस्तान तो है ही कलाकारों का घर।मैं बेवजह ही अपनी छाती फुलाता हूँ।
बाबूजी, एक पंजी…भगवान तुम्हारा भला करे…तुम्हारे बच्चे जीएँ…।अंधा सभी के सामने हाथ फैलाता है।
मुझे जैसे अपना और अपने हिंदुस्तान का मान कम होता हुआ लगता है।
अंधे को बढ़िया कलाकार कहने वाले सभी लोग एक-एक कर वहाँ से खिसकने लगते हैं।
अबे ओ अंधे! तूने आज फिर यहाँ भीड़ जमा कर ली। तुझे कितनी बार कहा है, यहाँ चौक में मजमा न लगाया कर। फिर भी तू मजमा लगा के बैठ जाता है। तू ऐसे नहीं मानेगा…डंडा घुमाते हुए आए सिपाही ने उसे धौल जमा दी।
बूढ़ा शरीर धक्का खाकर नाली के किनारे जा गिरता है। हाथ में इकट्ठे हुए पैसे नाली में जा गिरते हैं।
साले को कितनी बार कहा है, पर ऐसे कहाँ अक्ल आती है…जब तक थाने में लेजाकर न सेंके।
एक-एक कर सभी लोग खिसक गए।
‘यह भई हिंदुस्तान है…और हिंदुस्तान तो है ही कलाकारों का घर।–अपने कहे शब्दों को याद कर मुझे लगता है जैसे मेरी छाती रीढ़ की हड्डी से जा मिली हो।
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Friday, 15 October 2010

मायाजाल

दर्शन मितवा

वह सहज रूप से चला जा रहा था।
सामने सड़क पर पड़े पैसे उसे नज़र आए तो चारों ओर से चौकस हो, पैसे उठा उसने अपनी मुट्ठी खोली तो देखा, दो रुपए थे। एक-एक के दो नोट।
क्षण भर के लिए वह खुश हुआ और रुपए जेब में डाल कर आगे चल पड़ा। फिर उसे जैसे कुछ याद गया। उसकी रफ्तार पहले से धीमी हो गई।
अगर कहीं ये दोनों दस-दस के नोट होते तो बात बन जाती।यह सोचकर वह उदास हो गया।
कम से कम कुर्ता-पायजामा हीअगर कहीं सौ-सौ के होते तोपौ-बारह हो जातीवाह रे भगवान, जब देने ही लगा था तो बस दो ही!…तू देता तो है, पर हाथ भींचकर। कभी एक साथ दे दे बीस-पचास हजारहम भी जिंदा लोगों में हो जाएँ
सोचते-सोचते उसने अपना हाथ पैंट की जेब में ऐसे डाला जैसे रुपए वास्तव में ही दो से बढ़ गए हों। मगर उसका कलेजा धक से रह गया।
उसका हाथ जेब के आरपार था। दो रुपए फटी जेब से कहीं गिर गए थे।बसवह रुआँसा हो गया, “वे भी गए साले।आज की रोटी का ही चल जाता।
वह फटी जेब में हाथ डाल वहीं खड़ा हो गया और चारों ओर ऐसे निगाह डाली जैसे अपना कुछ खोया हुआ ढूँढ रहा हो।
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