Showing posts with label रणजीत कोमल. Show all posts
Showing posts with label रणजीत कोमल. Show all posts

Sunday, 2 February 2014

चौकीदारी



रणजीत कोमल

दो-तीन डॉक्टर बदलने के बाद भी पाला सिंह की छाती का दर्द ठीक नहीं हुआ था। उससे दर्द सहन नहीं होता था। डॉक्टरों ने उसकी तीमारदारी में लगे बेटों को किसी बड़े अस्पताल में इलाज करवाने की सलाह दी।
पाला सिंह को लग रहा था कि उसका आखरी समय आ गया है। उसने आँसू भरी आँखों से अपने बेटों तथा जवान बेटी की तरफ देखा और बोला, बेटो, अब तो पल भर का भरोसा नहीं…ऊपर वाले ने पता नहीं कब बही खोल कर बुलावा भेज देना है…तुम्हारी माँ की लंबी बीमारी के कारण, बेटी को अपने हाथों विदा नहीं कर सका। अब तुमने मिलकर अपनी माँ को सँभालना है और बहन के हाथ पीले करने हैं।बातें करते हुए पाला सिंह ने एक गहरी साँस ली और वही उसकी अंतिम साँस बन गई।
पिता के आंतिम संस्कार के बाद बेटों ने फैसला किया कि बीमार माँ की जिम्मेदारी सबकी बराबर की होगी और शादी तक बहन माँ के साथ रहेगी।
तय समय के बाद माँ बेटी के साथ जब जूसरे बेटे के घर रहने पहुँची तो भीतर से उनके कानों में आवाज़ सुनाई दी, मैंने कहा जी, तुम्हारी माँ और बहन आ गईँ। तुम्हारी माँ का रोना तो रोना ही पड़ेगा, साथ में तुम्हारी बहन की रखवाली भी करनी पड़ेगी। अब मैं किस कुएँ में गिरूँ?
                         -0-

Sunday, 3 January 2010

बोहनी



रणजीत कोमल

गर्मी पूरे जोरों पर थी। गाँव को जाती सड़क पर सिर्फ उसी की साइकिलों की मरम्मत की दुकान थी। परछाइयाँ ढलने पर थीं, पर अभी बोहनी ही नहीं की थी। उबासियां लेता वह ग्राहक का इंतजार कर रहा था। कभी वह बक्से में पड़े सामान की तरफ देखता और कभी सड़क की तरफ। उसे ग्राहक के आने की कोई आशा नज़र नहीं थी आ रही। उसे बार-बार बच्चों का ध्यान आ रहा था, जिन्हें दिहाड़ी कमा कर ही रात को खिलाना था।
अचानक ही एक बुजुर्ग रिक्शेवाला फूली सांस उसके पास आया।
“इसे देखना, यार! इसकी बस चलाते ही हवा निकल गई…।” पसीना पोंछते बुजुर्ग ने पिछले टायर की तरह इशारा करते हुए कहा।
टायर खोलने में दुकानदार ने एक मिनट भी नहीं लगाया। उसने ट्यूब चैक करनी शुरू की। एक साथ तीन पंक्चर देखकर दुकानदार के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
तीन पंक्चर देखकर बुजुर्ग का चेहरा मुरझा गया। आज तो बोहनी ही नहीं की कैसे चलेगा।
-0-