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Sunday, 7 July 2013

आग



                       
बूटा राम

बापू जी! मैं आपको कह कर तो गया था कि दोपहर से पहले दुकान बढ़ाकर चले जाना। यह सारा कारनामा आपके जिद्दी स्वाभाव और बात न मानने के कारण हुआ है।तीर्थ ने अपने पिता मदन लाल को दुकान के बाहर हुए नुकसान का जायज़ा लेने के बाद कहा।
बेटे! मुझे तो पता ही नहीं चला कि कब हजूम आया और कब एक-एक करके दुकान की चीजें तोड़नी शुरू कर दीं…हरामियों ने मेरा स्कूटर भी जला दिया।मदन लाल ने अपना दुखड़ा रोना शुरू कर दिया।
मैं मानता हूँ…मैं मानता हूँ कि आपको पता नहीं चला, पर ये नौकर कहाँ मर गए थे?
जब हजूम दुकान के आगे आकर रुका, वे सभी तो उसी वक्त भाग गए…मैं अकेला किस-किस को रोकता कि यह काम मत करो। पर बेटे! अगर दुकान लुटने से बचानी थी और तुम्हें इस हलचल का पहले से पता था, तो तू दुकान पर खुद ठहरता या बढ़ाकर ही जाता।मदन लाल ने भी अपनी दलील दी।
मैं कैसे ठहरता…बजाज वालों की दुकान भी तो जलानी थीतीर्थ के मुँह से सहज ही ये शब्द निकल गए।
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Thursday, 29 November 2012

मोल



बूटा राम

मुझे अपने सहकर्मी जगतार के बेटे के एक्सीडेंट बारे पता चला। मैं उसका हालचाल जानने हेतु तुरंत अस्पताल पहुँच गया। जगतार उस समय अस्पताल में नहीं था। उसकी पत्नी लड़के के पास थी।
सति श्री ’काल बहन जी!
उसने दोनों हाथ जोड़कर ‘सति श्री अकाल’ कबूल कर ली। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि बात कैसे शुरु करूँ। कुछ क्षण बाद मैंनें कहा, बहन जी, कैसे हो गया यह एक्सीडेंट?
यह सुबह अपनी ड्यूटी पर जा रहा था। अचानक मोटर-साइकिल के आगे कुत्ता आ गया। इससे कंट्रोल नहीं हुआ…।
रब्ब का शुक्र करो कि बचाव हो गया। वैसे सिर पर तो चोट नहीं लगी?
पगड़ी करके सिर की चोट से तो बचाव हो गया। पर एक तरफ ज़ोर से गिरने के कारण लात टूट गई…अब…।उसकी आँखों में पानी आ गया।
लड़के की जान बच गई। उस मालिक का शुक्र करो। जवान है, ज़ख़्म जल्दी ही भर जाएँगे।मैंने ढ़ारस बँधाया।
जवान होने का तो दुःख है, वीर जी! कहाँ हमने नौकरी लगे लड़के का रिश्ता अच्छे घर में करना था…पर अब तो इसका मोल ही खत्म हो गया। पता ही नहीं अब तो कोई इसे लड़की भी देगा या नहीं…।
उसकी बात सुनकर मेरे पाँवों के नीचे से जमीन खिसक गई।
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