Monday, 12 December 2011

अपना घर


जगदीश राय कुलरियाँ

बहू की कही गई बातों के कारण वह सारी रात सो नहीं सका। सुबह सैर पर उसके मित्र ने पूछ ही लिया, क्या बात है वेद प्रकाश, आज तुम्हारा मूड ठीक नहीं लग रहा। जरूर घर पर किसी ने कुछ कहा होगा।
क्या बताऊँ भई! जब अपने जन्मे ही बेगाने हो जाएँ तो दूसरा कौन परांठे देगा। तुझे पता ही है कि रिटायरमेंट के कुछ समय बाद ही तुम्हारी भाभी तो भगवान को प्यारी हो गई थी…बस उसके बाद तो मेरा जीवन नर्क ही बन गया…।
न… बात क्या हो गई?मित्र ने पूरी बात जानने की उत्सुकता से पूछा।
बात क्या होनी थी… बस शाम को दोनों मियाँ-बीबी सिनेमा जाना चाहते थे…इसलिए जल्दी ही रोटियाँ बना कर रख दीं…बहू ने मुझे कहा– ‘पापा जी, रोटी खा लो’…।
फिर?
मैने कहा‘बेटा, मुझे अभी भूख नहीं, बाद में आने पर दे देना।’…बस मेरे इतना कहने की देर थी कि बहू का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया‘न, हमें और कोई काम नहीं…रात को आकर रोटी दें…हमने सोना भी है…हमारी भी कोई लाइफ है…न आप ठीक से जीते हैं, न दूसरों को जीने देते हैं।’…और भी बहुत कुछ कहा…बोलते-बोलते उसका गला रुंध गया।
देख भाई वेद प्रकाश! करना तो तुम अपनी मर्जी…मेरी तो यही राय है…तुम्हारे पास पैसे-टके की तो कोई कमी नहीं, पर औरत के बिना इस उम्र में आदमी की ज़िंदगी नरक बन जाती है। मैं तो कहता हूँ कि किसी ज़रूरतमंद पर चादर डाल ले…।
तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया?… मैं इस उम्र में ऐसा काम करूँगा तो दुनिया क्या कहेगी?
दुनिया की ज्यादा परवाह नहीं करते…सबको अपनी ज़िंदगी जीने का अधिकार है…और किसी वृद्ध-आश्रम में जाकर मरने से तो अपने घर में सुखी जीवन व्यतीत करना कहीं अच्छा है।
वेद प्रकाश अपने मित्र की बातों से सहमति-सी प्रकट करता अपने नए घर की तलाश में जुट गया।
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Sunday, 4 December 2011

अपना-अपना हिस्सा


नरिंदरजीत कौर
अचानक घटी दुर्घटना में माँ-बाप की मृत्यु हो जाने पर, कुलजीत तो जैसे टूट ही गई थी। उसे अपना मायका तो खत्म हुआ लगता था।
माँ-बाप को गुज़रे अभी दो महीने भी नहीं हुए थे कि उसके दोनों भाइयों ने जायदाद का बँटवारा करने का निर्णय कर लिया। कुलजीत को भी सँदेश मिला। कुलजीत जानती थी कि जायदाद तो दोनों भाइयों ने आपस में ही बाँटनी है, उसे तो केवल दुनियादारी के लिए ही बुलाया गया है।
उसके पति हरजीत ने उसे समझाना चाहा, देख कुलजीत, हमें कुछ नहीं चाहिए। ऊपर वाले का दिया सब कुछ है। और न ही मैं यह चाहता कि कोई तुझे अबा-तबा बोले। इसलिए में तो कहता हूँ कि तू मत जा।
अपने पति की इस सोच के लिए कुलजीत ने मन ही मन वाहेगुरू का शुक्रिया अदा किया। पर वह देखना चाहती थी कि माँ-बाप की खून-पसीने की कमाई से खड़े महल की दोनों भाई कैसे काट-छांट करते हैं।
कुलजीत खामोशी से दोनों भाइयों को सब कुछ बाँटते हुए देखती रही। उन्होंने चम्मच-चिमटे तक बाँट लिए गए। दोनों भाइयों ने अपना-अपना हिस्सा सँभाल लिया। अंत में कुछ अनावश्यक सामान कुलजीत के हिस्से में आया। उस सामान को भरे मन से बाँहों में समेट कर वह घर लौट आई।
यह क्या है?हरजीत ने हैरान होते हुए पूछा।
यह है मेरा हिस्सा।
इतना कह कुलजीत ने अपनी शाल में से अपने माँ-बाप की तस्वीर निकाली। उसने काँपते होठों से उसे चूमा और मेज पर रख, फूट-फूट कर रो पड़ी।
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Sunday, 27 November 2011

बुजुर्ग


                      
रशीद अब्बास

आषाढ़ के महीने हैदर शेख की जेठी चौकी के कारण बाज़ार में भीड़ थी। ठेले ऊपर सरिया लादे एक मज़दूर आ रहा था। वह ठेले को भीड़ से बचाता रहा था। जब वह सड़क किनारे खड़े एक मोटर-साइकिल के पास से निकालने लगा तो ठेले पर लदा सरिया मोटर-साइकिल से रगड़ खाने लगा।
देखना बुजुर्गो! कहीं नुकसान ही न कर देना… एक तरफ कर निकाल लो। सरिया भी तो सारे शहर का लाद रखा है…।मोटर-साइकिल की चिंता में खरीदारी बीच में ही छोड़, मास्टर मिंदर सिंह शौरूम में से फुर्ती से बाहर आते हुए बोला।
सासरी 'काल, मास्टर जी!मज़दूर ने नम्रता-पूर्वक हाथ जोड़ कर कहा।
सति श्री अकाल! बुज़ुर्गो, तुमने इतना सरिया क्यों लाद लिया? अपनी उम्र का तो ख़याल किया करो…।मज़दूर की सफेद दाढ़ी और ख़स्ता सेहत को देखते हुए मास्टर जी ने अपनी डॉई की हुई दाढ़ी पर हाथ फिराते हुए कहा।
मास्टर जी… आपने शायद मुझे पहचाना नहीं… तभी मुझे बार-बार बुज़ुर्ग कह रहे हैं… मैं बंता हूं… आपका शागिर्द…रुड़की गाँव की दलित-बस्ती वाला…।अँगोछे से पसीना पोंछते हुए मज़दूर ने कहा।
भीड़ के कारण बंता ठेला धकेलता आगे निकल गया और मास्टर जी बेसुध खड़े पंद्रह-बीस वर्ष पहले के उन दिनों बारे में सोचने लगे जब बंता दसवीं कक्षा का होनहार विद्यार्थी था।
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Sunday, 20 November 2011

बेगानी बेटी


बलवंत कौर चाँद
शरनी के विवाह को यद्यपि बारह वर्ष हो गए थे, परंतु अभी तक उसे अपने पति के वेतन का ही पता नहीं लगा था।
वेतन वाले दिन बेबे दरवाजे पर खड़ी प्रतीक्षा करती और गुरदयाल भी वेतन माँ को थमा कर ही अपने कमरे में जाता।
आज वेतन का दिन था। इस बार शरनी ने पहले ही पति को मना लिया था कि अब वेतन उसे दिया करे क्योंकि माँ ने तो सभी लड़कियों की शादी कर दी है। अब तो उनकी जीती भी बड़ी हो चली है और बच्चों की ट्यूशन फीस भी उसे माँ से माँग कर देनी पड़ती है। कई बार तो माँ के पास छुट्टे पैसे नहीं होते और बच्चे रो-रो कर स्कूल जाते हैं। उनकी अध्यापिका उन्हें क्लास में खड़ा कर देती है और कई बार तो वापस घर ही भेज देती है।
गुरदयाल सिंह ने ‘हाँ’ में सिर हिला तो दिया, लेकिन बेबे को छोड़कर पत्नी को वेतन देना, उसे एक गहरी खाई पार करने के समान लग रहा था।
वही बात हुई। बेबे हर बार की तरह दरवाजे पर खड़ी थी।
बेबे, अब मैं वेतन शरनी को दिया करूँगा।
न बेटा! बेगानी बेटियां कब घर बनाती हैं। ये तो उजाड़ा करती हैं। यह तो मैं ही हूँ जिसने सारा घर सँभाल कर रखा है।यह कहते हुए माँ ने आज भी वेतन पकड़ लिया।
शरनी भी दरवाजे के पीछे खड़ी, सब देख-सुन रही थी। ‘बेगानी बेटी’ सुन कर उसका कलेजा फट गया। उसने दरवाजे के पीछे से निकल, सास के हाथों से पैसे उठाते हुए कहा, बेबे, आप भी इस घर में ब्याही आई थीं, इसलिए ‘बेगानी बेटी’ ही हुईं।
फिर वह अपने पति को जीत का अहसास कराती अंदर चली गई।
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Wednesday, 16 November 2011

माँ का रुदन


कुलदीप माणूँके

शाम कौर पिछले सप्ताह से पी.जी.आई अस्पताल में दाखिल थी। उसके दोनों लड़के सरकारी विभागों में अधिकारी थे। दोनों बारी-बारी से आकर माँ का हाल-चाल पूछ रहे थे। बड़े लड़के ने छोटे से कहा, बलदेव! मैं अब एक हफ्ता नहीं आ सकता। तेरे भतीजे के पेपर हैं। मेरे डर से वह चार अक्षर पढ़ लेगा।
वीर जी, मेरे दफ्तर में तो ऑडिट चल रहा है। मेरा यहाँ माँ के पास रह पाना कठिन है।छोटे बलदेव ने कहा।
उनकी बहन किंदी पहले दिन से ही माँ के पास अस्पताल में थी। दोनों भाइयों की बात सुनकर वह बोली, वीर जी! आप दोनों जाओ, मैं हूँ ना यहाँ। मैं सँभाल लूँगी माँ को।
दोनों भाई वापसी की तैयारी करने लगे। मां रो रही थी। वह सोच रही थी, वह तब क्यों रोई थी, जब किंदी पैदा हुई थी?
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Monday, 7 November 2011

चोट


पूनम गुप्त (डॉ.)

नित्य की तरह उस दिन भी मनजीत दफ्तर से घर आ रही थी। अचानक मोड़ पर दूसरी ओर से आ रही कार से टकराकर वह स्कूटर समेत गिर पड़ी। चोट ज्यादा नहीं लगी थी। साहस जुटा वह उठी और धीरे-धीरे स्कूटर चला किसी तरह घर पहुँच गई। उसका पति महेंद्र भी दफ्तर से घर आ चुका था।
कुछ देर बाद मनजीत ने ऐक्सीडेंट की घटना महेंद्र को बतानी शुरू की। अभी वह अपनी बात पूरी कर ही रही थी कि उसकी बात बीच में ही काटते हुए महेंद्र बोला, तुमने अंधाधुंध चलाया होगा स्कूटर! और तुमने क्या करना था!
हमदर्दी के दो शब्दों की जगह पत्थर की तरह गिरे वे बोल सीधे मनजीत के दिल पर लगे। शरीर की अंदरूनी चोटों के साथ-साथ दिल पर लगी इस गहरी चोट का दर्द पहले से कहीं अधिक उसके चेहरे और आँखों से टपक रहा था।
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