Saturday, 16 July 2011

हमने क्या लेना

गुरचरण चौहान


मैं और रणजोध सिंह निहंग हमारे गांव के साथ लगते गाँव फकरसर पिण्डी साहिब में लगते बैसाखी के मेले में पहुँचे ही थे कि समाधियों की ओर शोर-शराबा मच गया। जब मैं तथा रणजोध सिंह समाधियों की ओर गए तो पता लगा कि कुछ आवारा लड़कों ने माथा टेक रही लड़कियों से कोई गलत हरकत की थी। रणजोध सिंह आपे से बाहर हो गया, पकड़ लो इन मुस्टंडों को…कुत्ते के बीज…ठहरो तुम्हारी…।
रणजोध ने कमरबंद कमर पर कस लिया था। लड़के अपने मोटर-साइकिल पर बैठ भाग लिए थे।
चल छोड़, हमने क्या लेना…।मैंने निहंग का कड़े वाला हाथ पकड़ लिया था।
हम सारा दिन मेले में घूमते रहे। निहंग के माथे पर पड़ी त्योरियां सारा समय विष घोलती रहीं।
दिन ढ़ले तालाब की तरफ फिर शोर मचा। निहंग मुझे भीड़ में छोड़ तालाब की ओर दौड़ गया। भीड़ से बचता-बचाता मैं किसी तरह शोर-शराबे वाली जगह पहुँचा। नहाने वाली जगह पर एक निहंग ने किसी औरत से अश्लील हरकत की थी। नंगी तलवार ऊपर उठा ललकारे मारता रणजोध सिंह, उस निहंग के चारों ओर चक्कर लगा रहा था।
मैंने फिर रणजोध की तलवार वाली बाँह पकड़ ली, छोड़ परे निहंग, हमने क्या लेना…!
इन पाखंडियों ने ही तो पंथ को बदनाम किया है…छोड़ दे मुझे मास्टर…अगर कलगीधर दशमेश-पातशाह भी ‘हमने क्या लेना’ वाली बात सोचते तो आज हमारा इतिहास कुछ और ही होना था।
मुझे लगा जैसे मेरी रूह मुझमें से मनफ़ी हो गई है।
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Saturday, 9 July 2011

अंतर

एम. अनवार अंजुम

राजकीय प्राथमिक विद्यालय से पाँचवीं की परीक्षा पास करने के पश्चात राजू ने राजकीय हाई स्कूल में दाखिला ले लिया।
प्राथमिक स्कूल में पढ़ते समय उसे स्कूल से अनुपस्थित रहने की आदत पड़ गई थी। हाई स्कूल में भी वह पाँच दिन अनुपस्थित रहने के बाद स्कूल पहुँचा। कक्षा इंचार्ज ने उसे कक्षा से बाहर कर दिया।
राजू बाहर जाने की जगह मैडम रश्मि के पास गया और उस की टाँगें दबाने लग गया। मैडम ने उसे परे धकेलते हुए कहा, जा, अपने पिता को साथ लेकर आना।
यह सुन राजू ने मिन्नत की, मैडम, मुझे क्लास से बाहर न निकालो। मैं आप के बालों में तेल की मालिश कर दिया करूँगा।
बद्तमीज, निकल जा अभी स्कूल से बाहर…।मैडम ने राजू के मुँह पर जोरदार चपेड़ मारते हुए हुक्म सुनाया।
अपनी गाल को पलोसते हुए स्कूल से बाहर जाते हुए राजू पहले वाले स्कूल की मैडम और मैडम रश्मि के व्यवहार में अंतर का कारण ढूँढ़ने का प्रयास कर रहा था।
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Saturday, 2 July 2011

भड़ास


हरप्रीत सिंह राणा

दिन भर दफ्तरी फाइलों में मगज खपा, छुट्टी के बाद वह थका-हारा सुस्त रफ्तार से साइकिल चलाता हुआ घर जा रहा था। एक मोड़ पर उसका साइकिल दूसरी ओर से आ रहे दो लाल फीतियों वाले शराबी के साइकिल से जा टकराया। दोनों गिरते-गिरते बचे। गलती पुलिसवाले की थी। वह शराब के नशे में गुट्ट, गलत दिशा में चल रहा था।  पुलिसवाला उसकी गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दहाड़ा, साले, अँधा है क्या? देख कर साइकिल नहीं चला सकता?
वह गुस्से में काँपने लगा, पर शराबी पुलिसवाले के आगे कुछ भी बोलने की हिम्मत न कर सका। वह सब्र का घूँट पी कर रह गया। एक दफ्तरी बाबू हवलदार के सामने क्या बोलता। हवलदार की गालियाँ सुनता वह चुपचाप अपने राह चल दिया। लेकिन इस असहनीय अपमान से उसकी मानसिक दशा बिगड़ गई थी। वह हाँफता हुआ तेजी से सइकिल दौड़ाता रहा था। मन ही मन वह उस पुलिसवाले की माँ-बहन एक करता हुआ मन को शांति दे रहा था।
अचानक उसका साइकिल पैदल जा रहे एक प्रवासी मज़दूर में जा टकराया। मज़दूर दिन भर की मेहनत के बाद रात के भोजन के लिए राशन का थैला उठाए जा रहा था। मज़दूर गिर गया और उसके थैले का राशन सड़क पर बिखर गया। उसने गिर गए मज़दूर की पसलियों पर चार-पाँच ठोकरें लगा दीं। मज़दूर दर्द से चीख उठा।
कुत्ते, हरामजादे…तेरी बहनकी…साले, एक तरफ होकर नहीं चल सकता?उसने गालियों की बौछार कर दी। फिर एक-दो लातें और जमा साइकिल उठा बड़बड़ाता हुआ घर की ओर चल दिया। अब उसकी आँखों में जीत की चमक थी और मन हल्का फूल-सा हो गया था।
मज़दूर दर्द से कुरलाता हुआ उठा। उसकी आँखों से परल-परल आँसू बह रहे थे। तभी वहाँ से गुजरने वाला एक आवारा कुत्ता सड़क पर बिखरे आटे को सूँघने लगा। मज़दूर ने फुर्ती से सड़क पर गिरी अपनी जूती उठाई और ज़ोर से कुत्ते के दे मारी। कुत्ता ‘चऊँ-चऊँ’ करता हुआ भाग गया। मज़दूर ने कुत्ते को एक भद्दी-सी गाली दी और बिखरा सामान समेटता हुए अपने राह चल दिया।
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Monday, 27 June 2011

रुका हुआ व्रत


अरतिंदर संधू

नन्हीं कृति बार-बार रसोई के चक्कर लगा रही थी। वहाँ बन रहे हलवे-पूरी व अन्य पकवानों की महक उसे बेचैन कर रही थी। लेकिन उसकी माँ ममता उसे खाने को कुछ नहीं दे रही थी। वास्तव में ममता ने नवरात्रों के व्रत रखे हुए था और आज अष्टमी के दिन कंजकों को भोजन करा, चुनरी-खिलौने आदि देकर ही व्रत की पूर्ति होनी थी।
अधेड़ उम्र की औरतों ने उसे सलाह दी थी कि वह ग्यारह कन्याओं को खुश कर माता से पुत्र का वर माँगे। कृति छः वर्ष की हो गई थी। इस बीच चार अजन्मी कन्याओं को अपने घर आने से पहले ही वापस भेज चुकी थी, चाहे भरे मन से ही। इस बार व्रत द्वारा माता को खुश कर पुत्र प्राप्त कर लेने की उसे पूरी उम्मीद थी।
उसने आसपास के घरों में कंजकों की गिनती की, पर ग्यारह किसी भी तरह पूरी न हुईं। हार कर ममता की सास बोली, चल, पाँच कंजके ही बैठा ले, माता रानी सब जानती है।
ममता सुबह से ही जान-पहचान वाले घरों में चक्कर लगा रही थी। सभी घरों में राशन-स्कीम की तरह, लड़कियों के पैदा होने पर पाबंदी लगा दी गई थी। बहुत कोशिश के बाद , चार लड़कियाँ ही नज़र आईं और पाँचवी उसकी कृति। साल में दो बार ही ऐसा अवसर आता है, जब कन्याओं की माँग बढ़ जाती है।
ममता जब लड़कियों को बुलाने गई तो एक को तो तेज बुखार था। दूसरी नानी के घर गई थी। अन्य दो को आने के लिए कह, ममता प्रतीक्षा में घर पहुँची। उसे दरवाजे पर कृति उत्साह से भरी मिली और उसे रसोई की तरफ खींच ले गई। रसोईघर के दरवाजे पर पहुँच कर बोली, मम्मी, कंजकें आ गईं, अब पूरी दो।
कृति ने चार आसनों पर अपनी चार गुड़ियां सजाई हुई थीं और पाँचवे आसन पर स्वयं बैठ कर भोजन की प्रतीक्षा करने लगी।
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Saturday, 11 June 2011

सनसनीख़ेज़ ख़बर


अणमेश्वर कौर

वह सूखे की मार में आए क्षेत्रों की रिपोर्ट तैयार करने गया था। कहीं भी ज़िंदगी का नामो-निशान नज़र नहीं आ रहा था। सब ओर झोंपड़ियों में सन्नाटा छाया था। वह रिपोर्ट तैयार करने के लिए इधर-उधर भटक रहा था। लेकिन लोग अपने घरों व जानवरों को छोड़ कर जा चुके थे। सूरज ढ़ल रहा था। अचानक उसे किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
उसने एक झोंपड़ी में झाँक कर देखा। अंदर अँधेरा था। उसने टार्च जलाई। भीतर एक बूढ़ा चटाई पर पड़ा ‘पानी-पानी’ पुकार रहा था। पास ही बैठी बूढ़ी औरत रिपोर्टर को अंदर आया देख मदद की गुहार लगाने लगी। शायद परिवार के शेष लोग उन्हें अकेले ही सूखे से निपटने के लिए छोड़ गए थे।
पत्रकार बूढ़े को घसीट कर झोंपड़ी से बाहर ले आया। भूख-प्यास के बावजूद, बूढ़ी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई। उसने सोचा, शायद वह कुछ मदद करेगा। पर यह क्या! उसने अपने बैग में से कैमरा निकाला और लगा अलग-अलग  एंगल्ज से फोटो खींचने।
बाबू जी, पानी पिला दें, थोड़ा सा पानी। नहीं तो मेरा आदमी मर जाएगा, कल का प्यासा है।
माई! सूरज ढ़ल गया तो फोटो नहीं खींच पाऊँगा। मैंने आज ही सूखे की रिपोर्ट तैयार करके भेजनी है, फोटो के साथ।
मैने तो सोचा था कि बाहर लाए हो, पानी पिआओगे।
रिपोर्टर खुश था। उसे आज सबसे बढ़िया फोटो मिल गई थी। वह उनकी बिना कोई मदद किए, मुस्कराता हुआ गाड़ी में बैठ गया। हमेशा की तरह इस बार भी सनसनीख़ेज़ ख़बर लेकर।
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Tuesday, 7 June 2011

सुलह


भीम सिंह गरचा
मंगे!सरपंच ने मंगे लोहार की पूरी बात सुनकर तुरंत कहा, तू कह रहा है कि आज सुबह तेरी बड़ी लड़की गुरुद्वारे जा रही थी तो रास्ते में लंबड़दारों के प्रीते ने उससे छेड़खानी की। बात तो बहुत बुरी है! पर साथ ही यह बात भी है कि तू अपनी कमीज ऊपर करेगा तो तेरा ही पेट नंगा होगा। लड़की की बदनामी हो जाएगी।
कुछ देर रुक कर सरपंच फिर बोला, तू आप टी.बी. का मरीज है। चार बेटियों के बाद ईश्वर ने तुझे बेटा दिया है। मैंने तो सुना है कि वह भी बेचारा ठीक नहीं रहता। तू मेरी बात मान। तू अपनी लड़की वाली बात छिपाए रख। मैं तुझे लंबडदार से पचास किलो गेहूँ और सौ रुपये नगद…
सरपंच की बात सुन मंगे लोहार का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह ऊँची आवाज़ में ज़मींदारों को गालियां देने लगा। सरपंच के बेटों ने उसे धक्के मार कर बाहर निकाल दिया।
मंगा लोहार जब घर पहुँचा तो उसकी पत्नी रामरक्खी रोनी-सी आवाज़ में बोली, मैंने कहा जी, दोधी ने आज दूध नहीं दिया। वह पहले पैसे माँगता है। आटा भी खत्म हुआ पड़ा है। अपने घर रोटी नहीं पकी। आज सुबह से किसी ने चाय नहीं पी। और ऊपर से बेटे को ज़ोर का बुखार…।
मंगे ने जल्दी से बेटे के माथे पर हाथ रख कर देखा। सचमुच ही वह भट्ठी की तरह तप रहा था। फिर उसकी नज़र बेटियों के पीले पड़ गए चेहरों पर ठहर गई। उसने एक गहरी साँस ली और लरजती आवाज़ में कहा, रामरक्खी! मैं गुस्से में आकर सरपंच को बहुत बुरा-भला कह आया हूँ। तू जाकर उसके पाँव पकड़ ले। वह तुझे लंबड़दारों के घर से पचास किलो गेहूँ और सौ रुपये नगद दिलवा देगा।
फिर वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।
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