Thursday, 3 February 2011

अन्नदाता


डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति
      “राम भरोसे, इस तरह से कर, तू पहले मिट्टी से बट्टें बना ले, फिर प्याज की पनीरी लेकर…तू पहले इतना ही कर।” जोगिंदर सिंह अपने माली को अपनी कोठी में एक तरफ खाली पड़ी जगह पर सब्जी लगवाते हुए कह रहा था।
      राम भरोसे उसी तरह किए जा रहा था, जिस तरह उसे हिदायत होती। वास्तव में वह अभी जोगिंदर सिंह की कोठी में नया था।
      “इक बार में बात चंगी तरह समझ लेते हैं, समझा।” जोगिंदर सिंह ने कहा।
      इतने में ही कोठी के गेट के आगे कार रुकी और उसमें से तीन-चार आदमी उतरे। जोगिंदर सिंह उनकी तरफ चला गया।
      ‘सत श्री अकाल’ बुला कर वे लॉन में पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए।
      जोगिंदर सिंह ने राम भरोसे को चाय-पानी लाने को कहा। फिर वे सब बातें करने लगे।
      “देखो जी, जब तक केन्द्र से भइयों का राज नहीं जाता, तब तक देश की हालत सुधरेगी नहीं।”
      “बताओ भला, भइयों का राज जाएगा कैसे? चाहे राज किसी पार्टी का हो, आखिर प्रधानमंत्री तो भइया ही होगा।”
       “बात तो ठीक है, यू.पी. से ही ज्यादा सांसद आते हैं।”
       “पर फिर भी, कोई न कोई चारा तो किया ही जाए। ये भइये पिछले चालीस सालों से साले देश की धरती पर चढ़े बैठे हैं। देश को भूख न नंगेज के हवाले कर छोड़ा है। कम से कम एक बार तो निकाले ही जाएं।”
सभी मिल कर अपनी भड़ास निकालने पर लगे हुए थे।
      चाय पीकर वे चले गए। राम भरोसे को जब बर्तन उठाने के लिए बुलाया गया तो वह आकर जोगिंदर सिंह के पाँवों में पड़, रुआंसा-सा बोला, “आप हम को नहीं निकालना। आप हमारा माई-बाप हैं, सरकार!”
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Saturday, 22 January 2011

कलाकार


दर्शन मितवा
सड़क के किनारे मीठी और सोज़ भरी आवाज़ में कोई अंधा गा रहा है। उस के इर्द-गिर्द भीड़ जमा है। मैं भी भीड़ में हूँ।
एकत्र हुए लोग अंधे की तारीफ कर रहे हैं।
“देखो कितना अच्छा गाता है…पर बेचारा अंधा है। कितनी मीठी और दर्दभरी आवाज़ है…बोल कलेजे को छूते चले जाते हैं।”
“भाई यह हिंदुस्तान है…और हिंदुस्तान तो है ही कलाकारों का घर।” मैं बेवजह ही अपनी छाती फुलाता हूँ।
“बाबूजी, एक पंजी…भगवान तुम्हारा भला करे…तुम्हारे बच्चे जीएँ…।” अंधा सभी के सामने हाथ फैलाता है।
मुझे जैसे अपना और अपने हिंदुस्तान का मान कम होता हुआ लगता है।
अंधे को बढ़िया कलाकार कहने वाले सभी लोग एक-एक कर वहाँ से खिसकने लगते हैं।
“अबे ओ अंधे! तूने आज फिर यहाँ भीड़ जमा कर ली। तुझे कितनी बार कहा है, यहाँ चौक में मजमा न लगाया कर। फिर भी तू मजमा लगा के बैठ जाता है। तू ऐसे नहीं मानेगा…”डंडा घुमाते हुए आए सिपाही ने उसे धौल जमा दी।
बूढ़ा शरीर धक्का खाकर नाली के किनारे जा गिरता है। हाथ में इकट्ठे हुए पैसे नाली में जा गिरते हैं।”
“साले को कितनी बार कहा है, पर ऐसे कहाँ अक्ल आती है…जब तक थाने में लेजाकर न सेंके।”
एक-एक कर सभी लोग खिसक गए।
‘यह भई हिंदुस्तान है…और हिंदुस्तान तो है ही कलाकारों का घर।”–अपने कहे शब्दों को याद कर मुझे लगता है जैसे मेरी छाती रीढ़ की हड्डी से जा मिली हो।
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Saturday, 8 January 2011

ससुराल

डॉ. पूनम गुप्त

दौरे से वापस आया तो बड़े भाई साहब का फोन मिला, “तीन दिन हो गए नीरजा आई हुई है।”  
आठ महीने पहले ही नीरजा की शादी हुई थी। नीरजा भाई साहब की इकलौती बेटी है। नाम के अनुरूप ही सुंदर और समझदार। पता नहीं वह ससुराल में क्यों खुश नहीं थी। जब भी उससे फोन पर बात करता, वह रो पड़ती।
भाई साहब के घर गया तो नीरजा मेरे गले लग कर रो पड़ी। वह काफी कमज़ोर लग रही थी। ‘मैने वापस नहीं जाना।’ एक ही रट लगा रखी थी उसने। मैने उसे समझाना चाहा तो बोली, “सास बात-बात पर ताने देती रहती है। हर काम में टोकती है। मुझ से नहीं सहा जाता अब।”
मैने उसे समझाया कि एक दूसरे को समझने में वक्त लगता है, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।
“वहाँ कुछ नहीँ सुधरेगा, चाचा जी! मैं ही चाहे…” वह रो पड़ी।
उसका मन बहलाने के लिए मैं उसे बाहर लॉन में ले गया। टहलते हुए उसके साथ इधर-उधर की बातें करने लगा। तभी नीरजा का ध्यान कुछ मुरझाए हुए पौधों की ओर गया। वह बोली, “माली काका! जो पौधे आप परसों रोप कर गये थे, वे तो मुरझाए जा रहे हैं। सूख जाएँगे तो बुरे लगेंगे। इन्हें उखाड़ कर फेंक दो।”
 “नहीं बिटिया, ये सूखेंगे नहीं। ये नर्सरी में पैदा हुए थे, इन्हें वहाँ से उखाड़ कर यहाँ लगाया है। नई जगह है, जड़ें जमाने में थोड़ा समय तो लगेगा।”
माली की बात सुन नीरजा किसी सोच में डूब गई। थोड़ी देर बाद ही वह ससुराल जाने की तैयारी करने लगी।
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Friday, 31 December 2010

स्वागतम्

           ‘पंजाबी लघुकथा’ के सभी शुभचिंतकों  को नववर्ष की हार्दिक    शुभकामनाएँ! नववर्ष आपके समस्त परिवार के लिए मंगलमय हो!

Monday, 27 December 2010

बासमती की महक

सतिन्द्र कौर

“क्या हुआ?”
“एक्सीडेंट! ट्रक वाले ने एक आदमी को नीचे दे दिया।”
वह भीड़ में आगे बढ़ा। खून से लथपथ लाश उससे देखी न गई।
“चावल तो बासमती लगते है?” उसके कान में आवाज पड़ी।
“बढ़िया बासमती है। देख न कितनी अच्छी महक आ रही है।”
“ओ हो! कितना ज्यादा नुकसान हो गया। पाँच किलो तो होंगे ही?”
“हाँ। थैला भरा था।”
उसने देखा, उसके पास ही खड़े मैली बनियान पहने दो आदमी लाश के पास बिखरे पड़े चावलों को बड़ी हसरत से देख रहे थे।
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Wednesday, 22 December 2010

वर्दी


                                                                                            
 हरभजन खेमकरनी

हवेली के सामने बैठा सरपंच अपने समर्थकों के साथ मामले निपटाने संबंधी विचार-विमर्श कर रहा था। उनके समीप ही छुट्टी पर आया सरपंच का बेटा फौजी-वर्दी कसे बैठा था। वह अपनी मित्र-मंडली को फौज के किस्से चटखारे ले-ले कर सुना रहा था।
तभी गाँव लौटा सूबेदार निशान सिंह अपनी दलित बस्ती में जाने के लिए हवेली के सामने से गुजरा। उसे देखते ही सरपंच के बेटे ने खड़े होकर जोरदार सैल्यूट मारा। सैल्यूट का उत्तर देकर सूबेदार जब थोड़ा आगे बढ़ गया तो पीछे से किसी ने शब्दबाण छोड़े–
“आज़ादी तो इन्हें मिली है। देखा सूबेदार का रौब! सरपंच का बेटा भी सैलूट मारता है।”
“भाऊ जी, आदमी को कौन पूछता है! यह तो कंधों पर लगे फीतों की इज्जत है।”
“कोई बात नहीं, सूबेदार को संदेश भेज देते हैं कि आगे से वर्दी पहन कर गाँव में न आया करे।” सरपंच ने शून्य में घूरते हुए कहा।
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Friday, 10 December 2010

एक उज्जवल लड़की

श्याम सुन्दर अग्रवाल

रंजना, उसकी प्रेयसी, उसकी मंगेतर दो दिन बाद आई थी। आते ही वह कुर्सी पर सिर झुका कर बैठ गई। इस तरह चुप-चाप बैठना उसके स्वभाव के विपरीत था।

“क्या बात है मेरी सरकार! कोई नाराजगी है?” कहते हुए गौतम ने थोड़ा झुक कर उसका चेहरा देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। ऐसा बुझा हुआ और सूजी आँखों वाला चेहरा तो रंजना के सुंदर बदन पर पहले कभी नहीं देखा था। लगता था जैसे वह बहुत रोती रही हो।

“ये क्या सूरत बनाई है? कुछ तो बोलो?” उसने रंजना की ठोड़ी को छुआ तो वह सिसक पड़ी।

“मैं अब तुम्हारे काबिल नहीं रही!” वह रोती हुई बोली।

गौतम एक बार तो सहम गया। उसे कुछ समझ नहीं आया। थोड़ा सहज होने पर उसने पूछा, “क्या बात है रंजना? क्या हो गया?”

“मैं लुट गई…एक दरिंदे रिश्तेदार ने ही लूट लिया…।” रंजना फूट-फूट कर रो पड़ी, “अब मैं पवित्र नहीं रही।”

एक क्षण के लिए गौतम स्तब्ध रह गया। क्या कहे? क्या करे? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। रंजना का सिर सहलाता हुआ, वह उसके आँसू पोंछता रहा। रोना कम हुआ तो उसने पूछा, “क्या उस वहशी दरिंदे ने तुम्हारा मन भी लूट लिया?”

“मैं तो थूकती भी नहीं उस कुत्ते पर…!” सुबकती हुई रंजना क्रोध में उछल पड़ी। थोड़ी शांत हुई तो बोली, “मेरा मन तो तुम्हारे सिवा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकता।”

गौतम रंजना की कुर्सी के पीछे खड़ा हो गया। उसने रंजना के चेहरे को अपने हाथों में ले लिया। झुक कर रंजना के बालों को चूमते हुए वह बोला, “पवित्रता का संबंध तन से नहीं, मन से है रंजना। जब मेरी जान का मन इतना पवित्र है तो उसका सब कुछ पवित्र है।”

रंजना ने चेहरा ऊपर उठा कर गौतम की आँखों में देखा। वह कितनी ही देर तक उसकी प्यार भरी आँखों में झाँकती रही। फिर वह कुर्सी से उठी और उसकी बाँहों में समा गई।

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Thursday, 2 December 2010

रिश्तों का अंतर

हरभजन खेमकरनी

अपने एक संबंधी के विवाह समारोह में शामिल होने के लिए वह गाँव के बस-स्टैंड पर बस की प्रतीक्षा कर रहा था। उस के साथ उसकी नवविवाहित पत्नी, जवान साली तथा अविवाहित जवान बहन थीं। बस जैसे ही आकर उनके पास रुकी, वह सीटें रोकने के लिए जल्दी से बस में चढ़ गया। पिछले दरवाजे के पास ही तीन सवारियों वाली खाली सीट पर वह बैठ गया। उस की पत्नी उस के दाहिनी ओर बैठ गई और साली बाईं तरफ । उसकी बहन उनके पास आकर खड़ी हो गई। उसने बस में नज़र दौड़ाई। अगले दरवाजे के पास दो वाली सीट पर अकेला नौजवान बैठा था। खाली सीट की ओर इशारा करते हुए वह अपनी बहन से बोला, “बीरो, तू उस सीट पर जाकर बैठ जा।

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Thursday, 18 November 2010

रिश्ता

डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति

“मोगा से रास्ते की सवारी कोई न हो, एक बार फिर देख लो।” कहकर कंडक्टर राम सिंह ने सीटी बजाई और बस अपने रास्ते पड़ गई।
बस में बैठे निहाल सिंह ने अपना गाँव नज़दीक आते देख, सीट छोड़ी और ड्राईवर के पास जाकर धीमे से बोला, “डरैवर साब जी, जरा नहर के पुल पर थोड़ा-सा ब्रेक पर पाँव रखना।”
“क्या बात है? कंडक्टर की बात नहीं सुनी थी?” ड्राइवर ने खीझकर कहा।
“अरे भई, जरा जल्दी थी। भाई बनकर ही सही। देख, तू भी जट और मैं भी जट। बस जरा-सा रोक देना।” निहाल सिंह ने गुजारिश की।
ड्राइवर ने निहाल सिंह की ओर देखा और फिर धीमे से कहा, “मैं कोई जट-जुट नहीं, मैं तो मजबी हूँ।”
निहाल सिंह ने थोड़ा रुककर फिर कहा, “तो क्या हुआ? सिक्ख भाई हैं हम, वीर(भाई) बनकर रोक दे।”
ड्राइवर इस बार जरा मुस्कराया और बोला, “मैं सिक्ख भी नहीं हूँ, सच पूछे तो।”
“तुम तो यूँ ही मीन-मेख में पड़ गए। आदमी ही आदमी की दारू होता है। इस से बड़ा भी कुछ है।”
जब निहाल सिंह ने इतना कहा तो ड्राइवर ने गौर से उसे देखा और ब्रेक लगा दी।
“क्या हुआ?” कंडक्टर चिल्लाया, “मैने पहले नहीं कहा था, किस लिए रोक दी?”
“कुछ नहीं, कुछ नहीं। एक नया रिश्ता निकल आया था।” ड्राइवर ने कहा। निहाल सिंह तब तक नीचे उतर चुका था।
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Thursday, 11 November 2010

हवा का झोंका

गुरचरण चौहान

विदेश से लौटा शेखर भावुक होकर दिल्ली से रेल के दूसरे दर्जे के डिब्बे में सवार हो गया। डिब्बे में बेहद गर्मी और घुटन थी। दो-तीन स्टेशन निकल जाने के बाद, टी.टी.ई. से सम्पर्क कर वह ए.सी. डिब्बे में जा बैठा। ए.सी. डिब्बे में बैठकर उसे लगा जैसे वह स्वर्ग में आ गया हो।
दो-तीन स्टेशन गुजरने के बाद उसे महसूस होने लगा, जैसे यहाँ अलग ही तरह की घुटन है–चुपचाप अखबार पढ़ रहे लोग…अपने आप में मस्त, एक दूसरे को घूर रहे चेहरे…एक बोझिल-सा वातावरण। उसके कान तो अपनी माँ-बोली के मिश्री जैसे बोल सुनने को तरस रहे थे। उसे लगा जैसे वह ए.सी. डिब्बे में नहीं, फिर से विदेश में आ गया हो।
एक स्टेशन आया। गाड़ी रुकी। वह ए.सी. डिब्बे से छलांग लगा दूसरे दर्जे के डिब्बे में जा बैठा। उसके व्यक्तित्व को देख, खिड़की से सटे बैठे गाँव के एक मुसाफिर ने उठकर उसे जबरन सीट पर बैठा दिया। उस अधेड़ ग्रामीण मुसाफिर ने अपने थैले से एक मुट्ठी मूँगफली उस की तरफ बढ़ाई। उसने मूँगफलियाँ दोनो हाथों को जोड़ प्रसाद की तरह लीं। आसपास बैठी सवारियाँ मूँगफली पहले से ही खा रही थीं। उसने अनुमान लगाया, यह इस ग्रामीण की ओर से बाँटा गया प्रसाद है।
सीट पर बैठ, खिड़की से कोहनी टिका, उसने कमीज का कालर गरदन से पीछे किया। अब उसने महसूस किया–हवा के झोंके उसकी गरदन के आसपास स्पर्श कर रहे थे।
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