Monday, 15 February 2010

छोटे-छोटे ईसा


जसबीर ढंड

“शिंदर, तू कल क्यों नहीं आई?”
“जी, कल मेरी माँ बहुत बीमार थी।”
“क्यों क्या हुआ तेरी माँ को?”
“जी, उसकी न बगल के नीचे की नस भरती है। कल मानसा दिखाने जाना था।”
“दिखा आए फिर?”
“नहीं जी।”
“क्यों?”
“जी, कल पैसे नहीं मिले।”
“फिर?”
“जी, आज लेकर जाएगा मेरा बापू…।”
“आज कहाँ से आ गए पैसे?”
“जी, जमींदारों के से लाया है उधारे…।”
पहली कक्षा में पढ़ रही शिंदर अपने अध्यापक से सयानों की तरह बातें करती। सांवला रंग, मगर सुंदर नैन-नक्श। अपनी उमर के बच्चों से समझदारी में दो-तीन वर्ष बड़ी। उसकी माँ ने स्वयं तंगी भोग शिंदर को स्कूल बैठाया ताकि चार अक्षर सीख जाए।
अगले दिन वह एक घंटा देर से स्कूल पहुँची।
“लेट हो गई आज?” अध्यापक ने पूछा।
“जी, माँ आज फिर ज्यादा तकलीफ में थी…रोटियाँ पका कर आई हूँ…और पहले सारा घर संभाला…।”
अध्यापक उसके मुख की ओर देखता रहा, “तू रोटियाँ पका लेती है?”
“हाँ जी! सब्जी भी बना लेती हूँ…मेरी माँ लेटी-लेटी बताती रहती है, मैं बनाती रहती हूँ…।” लड़की के चेहरे से आत्मविश्वास झलक रहा था।
“आज तेरी माँ ने तुझे घर रहने को नहीं कहा?”
“न जी!…आज तो माँ मेरे बापू को कह रही थी–अगर मैं मर गई तो शिंदर को पढ़ने से न हटाना।”
कक्षा में चालीस-पचास बच्चों के बावजूद अध्यापक के भीतर एक खामोशी छा गई। सुन्न-सा हुआ वह लड़की की ओर देखता रहा…कितने ही छोटे-छोटे ईसा सूली पर लटक रहे हैं।
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Saturday, 6 February 2010

पलाल का सेंक





कारखाने की भट्टियों को चलाने के लिए पलाल जलाया जाता था। जब से यह शराब का कारखाना लगा, तब से ही भंता अपनी भैंसा गाड़ी में पलाल ढो रहा था। सारे सीजन में मुश्किल से पाँच-सात हजार ही बनते। बहुत जोर मारता, लेकिन भैंसे और गाड़ी ने तो अपनी ही चाल चलना था। घर में सौ खर्चे थे।
अड़ोस-पड़ोस के ट्रैक्टरों वाले, फेरे लगा-लगा के मालामाल हो गये थे। यह सब देख भंते को अपना-आप खेत में खड़े बिजूके जैसा लगने लगता और भैंसे की रफ्तार बढ़ाने के लिए वह अंधाधुंध सांटा चलाता।
उसके साथ मिट्टी हुई पत्नी को कभी ढंग का वस्त्र नसीब नहीं हुआ था। लेकिन जब ट्रैक्टर खरीदने की बात हुई तो उसने सारे गहने सामने लाकर रख दिए और बोली, “ये मेरे किस काम के हैं।”
बेटे को कमाई करने के लिए दुबई भेजने की चाह को वह हर बार अगले सीजन पर टाल देता। घरवाली के जेवर व थोड़ी-सी जमीन गिरवी रख, पैसे बैंक में जमा करवा, वह कर्जा लेकर ट्रैक्टर ले आया। ट्रैक्टर खरीदने के बाद उसने मन बना लिया कि जवान बेटी की शादी, घर और पत्नी की शक्ल–सूरत संवारने के लिए वह डट कर मेहनत करेगा तथा सभी धोने धो देगा।
धान की कटाई से पहले ही उसने लोगों से बात कर ली थी। बेटा भी इस बार रीझ पूरी होते देख पिता के कंधे से कंधा मिला कर काम करने को तैयार था। इस बार भाव भी ज्यादा निकला था। वह मन ही मन खुश था कि बैंक की किश्तें समय से चुका देगा।
धान की कटाई शुरु हो चुकी थी। पलाल की पहली ट्राली लादकर वह खुशी-खुशी कारखाने के दरवाजे तर पहुँचा तो गेटकीपर ने सहज ही कहा, “इस बार पलाल की जरूरत नहीं।”
“क्यों?”
“सरकार ने प्रदूषण रोकने के लिए बिजली से चलने वाले बायलर लगवा दिए हैं…।”
“हैं! भंते को ऐसा लगा जैसे वह कारखाने की भट्टी के सेंक से पूरे का पूरा जल गया हो।
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Tuesday, 26 January 2010

बंधन


सतिपाल खुल्लर

आज सगाई का दिन है। होने वाले दोनों समधी घनिष्ठ मित्र हैं। उनकी मित्रता को सारा शहर जानता है।

“मित्रता हो तो इन जैसी, नहीं तो बिन मित्र ही भले।” कोई कहता।

“मित्र तो लगते ही नहीं, यूँ लगता है जैसे सगे भाई हों,” कोई अन्य कहता, “वे सदा गले लग कर मिलते हैं।”

पिछले दिनों जब ये मित्र मिले तो एक ने कहा, “यार, क्यों न हम अपनी मित्रता को रिश्ते में बदल लें।”

“तुमने तो मेरे दिल की बात कह दी।” दूसरे ने खुश होकर कहा था। और फिर रिश्ते की बात पक्की हो गई।

“आज उन्होंने आना है और आप अभी तक उठे ही नहीं।” बिस्तर पर लेटे पति से पहले मित्र की पत्नी ने कहा।

“फिर क्या हुआ, मेरा मित्र ही तो है!” वह आँखों को मसलता हुआ उठ कर बैठ गया।

“पहले बात और थी, अब हम लड़की वाले हैं।” पत्नी ने सिर पर लिया दुपट्टा ठीक करते हुए कहा।

“ठीक है, मैं तैयार होता हूँ, तुम बेटे को बाज़ार से सामान लाने के लिए भेजो।”

“यह क्या पहन लिया, कोई ढंग का सूट पहनो।” उधर दूसरे की पत्नी ने अपनी रेश्मी साड़ी का पल्ला लहराते हुए पति से कहा।

“वे कौनसा हमें भूले हैं, सब जानते हैं, फिर सूट का क्या है।”

“अब पहले वाली बात नहीं रही। हम लड़के वाले हैं।”

“ठीक है, ठीक है।” वह मूँछों को उमेठता हुआ बोला।

शगुन-व्यवहार की रस्मों के पश्चात विदा होते वक्त दोनों मित्र गले मिले। दोनों को लगा कि उनकी मिलनी(जफ्फी) में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही।

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Monday, 18 January 2010

स्टार



केसरा राम


जैसा कि किस्से सुने थे, नये पुलिस कप्तान ने आते ही आदेश जारी कर दिए— ‘सभी गुंडे-बदमाश चौबीस घंटे में शहर छोड़ जाएं। यहाँ कोई भी गैर-कानूनी काम नहीं करने दिया जायेगा। बाजार में कोई भी खुलेआम शराब नहीं पियेगा।’
खबर सारे शहर में जंगल की आग की तरह फैल गई। शहरी थाने में मुंशी ने अपने तौर पर लगभग सभी बदमाशों को फोन द्वारा सावधान कर दिया। तीसरे दिन एस.पी. ने फोन कर इस बारे में पता किया। कई फोन तो ‘नो रिप्लाई’ हो गए। कुछ पर बच्चों ने बताया, “पापा कुछ दिनों के लिए दिल्ली चले गए हैं।”
लोगों की जेबें कटने की घटनाएं भी कम हो गईं।
एस.पी. लुंगी बनियान पहन कर बाजार में निकला। शराब के ठेके से एक पौआ लिया और ठेकेदार से गिलास माँगा। ठेकेदार ने ‘न’ में सिर हिला दिया। वह ठेकेदार के सामने शराबियों की तरह रिरियाया, “जनाब, दे भी दो, पौआ ही तो है… क्या घर लेकर जाऊँगा…यहीं पीकर वापस कर दूँगा… नहीं तो गिलास के भी पैसे ले लो…।”
“
नहीं भई, आजकल गिलास देना बंद है। घर जाकर पीओ…।”
उसने पूछा, “आखिर अब ऐसा क्या हो गया, पहले तो सब चलता था?”
तब ठेकेदार ने भेद खोला, “पहले तो सब चलता था, लेकिन अब जो एस.पी. आया है न, वह बडा़ हरामजादा है, कुछ नहीं चलने देता।”
एस.पी को लगा जैसे किसी ने उसके कंधे पर एक स्टार और लगा दिया हो।
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Sunday, 10 January 2010

निर्माता


इकबाल दीप


“और जनाब, आपकी तरफ हालात कैसे हैं?” प्रिंसिपल शर्मा ने शहर के मध्य में स्थित स्कूल के प्राचार्य को उत्सुकता से फोन पर पूछा। प्रिंसिपल शर्मा का स्कूल यद्यपि शहर से बाहर है, परंतु समाचार तो हवा के कंधों पर सवार होकर पहुँच ही जाते हैं। बसों की तोड़फोड़, दुकानें बंद, स्कूल-कालेज बंद।

“हालात आपसे छुपे हैं क्या शर्मा साहब!… कालेज के लड़के ‘मंडल कमिशन हाए-हाए’ करते हुए आते दिखाई दिए तो अन्य स्कूलों की तरह हमें भी छुट्टी करनी पड़ी।” प्राचार्य आर.पी. सिंह निश्चिंत हो बता रहे थे, “कौन तुड़वाए शीशे, फर्नीचर!”

“सिंह साहब, कालेज के लड़कों को हमारे स्कूल का रास्ता भी बता दो।” प्रिंसिपल शर्मा ने ‘ही-ही’ करते हुए विनती की।

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Sunday, 3 January 2010

बोहनी



रणजीत कोमल

गर्मी पूरे जोरों पर थी। गाँव को जाती सड़क पर सिर्फ उसी की साइकिलों की मरम्मत की दुकान थी। परछाइयाँ ढलने पर थीं, पर अभी बोहनी ही नहीं की थी। उबासियां लेता वह ग्राहक का इंतजार कर रहा था। कभी वह बक्से में पड़े सामान की तरफ देखता और कभी सड़क की तरफ। उसे ग्राहक के आने की कोई आशा नज़र नहीं थी आ रही। उसे बार-बार बच्चों का ध्यान आ रहा था, जिन्हें दिहाड़ी कमा कर ही रात को खिलाना था।
अचानक ही एक बुजुर्ग रिक्शेवाला फूली सांस उसके पास आया।
“इसे देखना, यार! इसकी बस चलाते ही हवा निकल गई…।” पसीना पोंछते बुजुर्ग ने पिछले टायर की तरह इशारा करते हुए कहा।
टायर खोलने में दुकानदार ने एक मिनट भी नहीं लगाया। उसने ट्यूब चैक करनी शुरू की। एक साथ तीन पंक्चर देखकर दुकानदार के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
तीन पंक्चर देखकर बुजुर्ग का चेहरा मुरझा गया। आज तो बोहनी ही नहीं की कैसे चलेगा।
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Monday, 28 December 2009

भूकंप



डा. कर्मजीत सिंह नडाला

बेटा सोलह वर्ष का हुआ तो वह उसे भी अपने साथ ले जाने लग पड़ा।
‘कैसे हाथ-पाँव टेढ़े-मेढ़े कर चौक के कोने में बैठना है, आदमी देख कैसे ढ़ीला-सा मुँह बनाना है। लोगों को बुद्धू बनाने के लिए तरस का पात्र बनकर कैसे अपनी ओर आकर्षित करना है। ऐसे बन जाओ कि सामने से गुजर रहे आदमी का दिल पिघल जाए और सिक्का उछलकर तुम्हारे कटोरे में आ गिरे।’
वह सीखता रहा और जैसा पिता कहता, वैसा बनने की कोशिश भी करता रहा। फिर एक दिन पिता ने पुत्र से कहा, “जा अब तू खुद ही भीख माँगा कर।”
पुत्र शाम को घर लौटा। आते ही उसने अपनी जेब से रुपये निकाल कर पिता की ओर बढ़ाए, “ले बापू, मेरी पहली कमाई…।”
“हैं! कंजर पहले दिन ही सौ रुपये! इतने तो कभी मैं आज तक नहीं कमा कर ला सका, तुझे कहाँ से मिल गए?”
“बस ऐसे ही बापू, मैं तुझसे आगे निकल गया।”
अरे कहीं किसी की जेब तो नहीं काट ली?”
“नहीं, बिलकुल नहीं।”
“अरे आजकल तो लोग बड़ी फटकार लगाकर भी आठ आने-रुपया बड़ी मुश्किल से देते हैं…तुझ पर किस देवता की मेहर हो गई?”
“बापू, अगर ढंग से माँगो तो लोग आप ही खुश हो कर पैसे दे देते हैं।”
“तू कौन से नए ढंग की बात करता है, कंजर! पहेलियाँ न बुझा। पुलिस की मार खुद भी खाएगा और हमें भी मरवाएगा। बेटा, अगर भीख माँग कर गुजारा हो जाए तो चोरी-चकारी की क्या जरूरत है। पल भर की आँखों की शर्म है…हमारे पुरखे भी यही कुछ करते रहे हैं, हमें भी यही करना है। हमारी नसों में भिखारियों वाला खानदानी खून है…हमारा तो यही रोजगार है, यही कारोबार है। ये खानदानी रिवायतें कभी बदली हैं? तू आदमी बन जा…।”
“बापू, आदमी बन गया हूँ, तभी कह रहा हूँ। मैने पुरानी रिवायतें तोड़ दी हैं। मैं आज राज मिस्त्री के साथ दिहाड़ी कर के आया हूँ। एक कालोनी में किसी का मकान बन रहा है। उन्होंने शाम को मुझे सौ रुपये दिए। सरदार कह रहा था, रोज आ जाया कर, सौ रुपये मिल जाया करेंगे…।”
पिता हैरान हुआ कभी बेटे की ओर देखता, कभी रुपयों की ओर। यह लड़का कैसी बातें कर रहा है! आज उसकी खानदानी रियासत में भूकंप आ गया था, जिसने सब कुछ उलट-पलट दिया था।
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Monday, 21 December 2009

दायित्व



डॉ. बलदेव सिंह खहिरा

“देख बापू! मुझे आए महीना भर हो गया। सभी रिश्तेदारों से पूछ लिया है, कोई भी आप दोनों को रखने के लिए तैयार नहीं। इस वृद्धावस्था में मैं आपको अकेले इस कोठी में नहीं छोड़ सकता। आप अपना लुक आफ्टर कर ही नहीं सकते।”
माता-पिता को खामोश देखकर वह फिर बोला, “वैसे भी अगले सप्ताह इस कोठी का कब्जा देना है। मैंने सारा बंदोबस्त कर लिया है। ओल्ड एज होम वाले डेढ लाख रुपये लेते हैं, फिर सारी उम्र की देखभाल उनके जिम्मे।”
“परमिंदर! हमने अपना घर छोड़ कर वृद्ध-आश्रम में नहीं जाना। तेरी मां तो बिलकुल नहीं मानती। तू जा अमरीका। हमें अपने हाल पर छोड़ दे, हमारा वाहिगुरु है।”
“माँ! बापू! आप बच्चों की तरह जिद्द क्यों कर रहे हो? कोठी तो बिक चुकी है। अपने मन को समझाओ।” कहकर परमिन्दर अपने कमरे में चला गया।
उसी रात बापू अकाल चलाना(स्वर्ग सिधारना) कर गया।
तीन दिन बाद बापू के ‘फूल’ कीरतपुर साहिब प्रवाह करके लौटे तो रिश्तेदारों ने परमिंदर को बताया, “माँ जी तो किसी को पहचानते ही नहीं, आंगन में बैठे कोठी की तरफ ही देखते रहते हैं। शायद वे पागलपन का अवस्था में है।”
परमिन्दर के मुँह से निकला, “तो फिर पागलखाने में भर्ती करवा देते हैं। आपको नहीं पता मेरा एक-एक दिन का कितना नुकसान हो रहा है। पीछे अपने परिवार का कितना बड़ा दायित्व है मेरे सिर पर।”
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Monday, 14 December 2009

सूरज


सुधीर कुमार सुधीर


कच्चे मकानों के बीच में बनी छप्पर वाली अंधेरी कोठरी में बैठा रुलदू शराब पी रहा था। उसकी घरवाली चूल्हे के पास बैठी धुआं फांक रही थी। सात साल का बेटा सूरज माँ के पास बैठा आटे की चिड़िया बना रहा था।

रुलदू ने भीतर से आवाज दी, “रोटी-पानी तैयार किया या नहीं, जरा जल्दी कर।”

सूरज की माँ बुड़बुड़ करने लगी, “आज कई दिन बाद दिहाड़ी लगी थी, चार पैसे घर लाने की जगह, यह जहर पीने बैठ गया। सब्जी कैसे बनेगी?”

रुलदू की बोतल खाली होने को थी। सूरज उस के पास जाकर खड़ा हो गया और बोला, “बापू, जल्दी बोतल खाली कर।”

“बोतल तूने क्या करनी है रे?” रुलदू क्रोधित होते हुए बोला।

“सब्जी में डालने के लिए नमक नहीं है, दुकान पर बोतल देकर नमक लाना है।”

सूरज के इन शब्दों को सुनकर रुलदू की आँखों के आगे अंधेरा छा गया।

रुलदू की घरवाली घर में रोशनी महसूस करने लगी।

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Tuesday, 24 November 2009

नई पगडंडी



परमजीत थेड़ी

गुरमुख सिंह व उसकी पत्नी विकासशील विचारों के थे। विवाह के बारह साल बाद भी उनके कोई औलाद नहीं हुई थी। उन की इच्छा थी कि परमात्मा उन्हें एक बच्चा दे दे, जो उनके बुढ़ापे का सहारा बने। वह लड़के-लड़की में कोई फर्क नहीं समझते थे।
और एक दिन उनके दरवाजे के आगे लोगों ने नीम बंधी हुई देखी। नीम बंधा देख, सभी के दिल खुशी से भर गए कि चलो बारह वर्ष बाद बेटा हो जाने से उनकी जड़ लग गई।
सायं गाँव के दस-बीस स्त्री-पुरुष मिलकर बधाई देने के लिए उनके घर गए।
“बधाई! भई गुरमुख सिंह।”
“आपको भी बधाई! रब्ब आपको भी बधाए।”
“भई, बेटा तो रब्ब सभी को दे। बेटों के बिना तो जग में नाम ही नहीं रहता।”
“पर मेरे घर तो बेटी पैदा हुई है, मेरे लिए तो यही बेटा है।”
“नीम तो खुशी प्रकट करने के लिए बाँधते हैं?”
“मुझे भी बेटी पैदा होने की बेटे से ज्यादा खुशी है। आजकल लड़के-लड़की में फर्क ही कहाँ है।”
अब गाँव वालों के चेहरे उदास हो गए। धीरे-धीरे बाहर आ रहे लोग कह रहे थे, “देख लो, बेवकूफों की कोई कमी नहीं, पैदा हुई लड़की और बाँध दिया नीम।”
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